Youth icon yi media logo . Youth icon media . Shashi bhushan maithani paras

यहां आज भी माँ, बेटी, बहिन को कर दिया जाता है घरों से बाहर ! बेटियों के साथ यह व्यवहार कहाँ तक जायज़ है ?

 

जिन बच्चियों को एक कुप्रथा के नाम पर इस तरह प्रताड़ित किया जाता होगा उन्हें कितना बड़ा मानसिक आघात पहुंचता होगा । मुझे अपने बचपन की याद है हम भी ग्रामीण परिवेश से हैं । मुझे भी बहुत सालों बाद पता चला कि आखिर यह नौटंकी है क्या ? दरअसल गांव में जब भी किसी महिला या बेटी को माहवारी होती थी तो परिवार में अजीब से कश्मकश देखने को मिलती थी । बच्चे जब अपनी माँ , चाची, भाभी या बहिन को घर से बाहर देखते थे और फिर उन्हें घर के अंदर आने के लिए जिद्द करते तो बुजुर्ग उन्हें यह कहते हुए झिड़कते हुए समझाते थे कि तेरी माँ ने घास काटते हुए गलती से मरी हुई गाय की हड्डी को छू लिया था इसलिए वो अब तीन से चार दिनों तक घर के अंदर नहीं आ सकती है ।

 

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शशि भूषण मैठाणी पारस

ज हम सब एक बार फिर से एक अंतराष्ट्रीय पर्व को मनाने की रस्म निभाने जा रहे हैं । ज्ञान बांटने में कोई कमी न रहे इसलिए पूर्व के वर्षों की भांति इस बार भी जरूर देश और दुनियाँ में बड़े मंचों से ज्ञान की गंगा हलक से छलक कर बहने को तैयार है । और यह हमेशा से होता आया है , बड़े-बड़े मंचों से ऊंचे-ऊंचे शब्दों की जरलरियों को जड़कर लच्छेदार भाषणों के साथ विघटित समाज को संगठित करने वाले कई नायक हम सबको आए दिन अपने आसपास ज्ञान बांटते हुए दिखाई देते हैं । और अगर कोई खास दिवस मिल जाए तो बात ही क्या ।

डॉ. सुमिता प्रभाकर, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं अध्यक्ष कैन प्रोटेक्ट फाउण्डेशन । Dr. SUMITA PRABHAKAR . YOUTH ICON DEHRADUN जिन बच्चियों को एक कुप्रथा के नाम पर इस तरह प्रताड़ित किया जाता होगा उन्हें कितना बड़ा मानसिक आघात पहुंचता होगा । मुझे अपने बचपन की याद है हम भी ग्रामीण परिवेश से हैं । मुझे भी बहुत सालों बाद पता चला कि आखिर यह नौटंकी है क्या ? दरअसल गांव में जब भी किसी महिला या बेटी को माहवारी होती थी तो परिवार में अजीब से कश्मकश देखने को मिलती थी । बच्चे जब अपनी माँ , चाची, भाभी या बहिन को घर से बाहर देखते थे और फिर उन्हें घर के अंदर आने के लिए जिद्द करते तो बुजुर्ग उन्हें यह कहते हुए झिड़कते हुए समझाते थे कि तेरी माँ ने घास काटते हुए गलती से मरी हुई गाय की हड्डी को छू लिया था इसलिए वो अब तीन से चार दिनों तक घर के अंदर नहीं आ सकती है ।

ज्यादा दूर न जाएं .. अब , सिर्फ अपने मोबाइल को ही खंगाल लीजिये, यहां सोशल मीडिया के समतल प्लॉट पर पल-पल में समाज को दिशा देने वाले कई उन ज्ञानियों के दर्शन हो जाते हैं जिनकी खुद की दिशा हमेशा से भटकी रही है, लेकिन वह फिर भी बिस्तर में बैठे-बैठे 6 x 3 इंच की स्क्रीन पर अपनी दो उंगलियों को थिरकाकर समाज को ज्ञान बांटने से पीछे नहीं हटते हैं ।

यह भी सच है कि ज्ञानियों के ज्ञान बांटने की भी सीमा तय होती है । किन-किन मुद्दे पर विद्वानों को अपना ज्ञान परोसना है इसके लिए खासा तैयारी होती है, स्थान एवं मंच भी वह स्वयं ही अपने हिसाब से निर्धारित करते हैं । मतलब साफ है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देने वाले देश में आज भी सुनने व सुनाने की अपनी एक निश्चित लक्ष्मण रेखा खींची हुई है, और जब तक समाज में भले व बुरे कामों का प्रमाण पत्र बांटने का लाइसेंस मंचासीन विद्वानों के हाथ में रहेगा तो ऐसे में किसी भी समाज में व्याप्त मिथ व कुरीतियों से बहुत जल्दी छुटकारा पाना भी बहुत आसान नहीं होता है ।

इस बार महिला दिवस पर पीरियड्स यानी मासिक धर्म, माहवारी पर लोगों से खुलकर बातें करने की अपील की जा रही है । और यह अपील एक विशेष अभियान के तहत देश के भिन्न-भिन्न 500 शहरों से एक साथ की जा रही  है, संभवतः यह अपील अनोखी होगी जो कि दुनियाँ के सामने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी दर्ज होगी । इस अभियान को Padman अक्षय कुमार Akshay Kumar की Niine Foundation द्वारा देशभर में आयोजित / प्रायोजित किया गया है । उद्देश्य है  Menstrual Hygien के प्रति awareness लाना । इसी कार्यक्रम को उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी देहरादून में Dr.Sumita Prabhakar के नेतृत्व में CanProtect Foundation के बैनर तले इस अभियान को आगे बढ़ाया जा रहा है   । ज्यादा जानकारी के लिए नीचे पोस्टर को पढ़ें । 

डॉ. सुमिता प्रभाकर, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं अध्यक्ष कैन प्रोटेक्ट फाउण्डेशन । Dr. SUMITA PRABHAKAR . YOUTH ICON DEHRADUN जिन बच्चियों को एक कुप्रथा के नाम पर इस तरह प्रताड़ित किया जाता होगा उन्हें कितना बड़ा मानसिक आघात पहुंचता होगा । मुझे अपने बचपन की याद है हम भी ग्रामीण परिवेश से हैं । मुझे भी बहुत सालों बाद पता चला कि आखिर यह नौटंकी है क्या ? दरअसल गांव में जब भी किसी महिला या बेटी को माहवारी होती थी तो परिवार में अजीब से कश्मकश देखने को मिलती थी । बच्चे जब अपनी माँ , चाची, भाभी या बहिन को घर से बाहर देखते थे और फिर उन्हें घर के अंदर आने के लिए जिद्द करते तो बुजुर्ग उन्हें यह कहते हुए झिड़कते हुए समझाते थे कि तेरी माँ ने घास काटते हुए गलती से मरी हुई गाय की हड्डी को छू लिया था इसलिए वो अब तीन से चार दिनों तक घर के अंदर नहीं आ सकती है ।

Join us in Celebrating  International Women’s Day . CanProtect Foundation Dehradun

 

यह सच है कि हम भले ही स्वयं को कितना भी खुले विचारों वाला क्यों न कह लें । लेकिन सच्चाई कुछ और ही कहानी बताती है । हमारे समाज में महिलाओं में होने वाली माहवारी अर्थात पीरियड्स को एक अभिशाप अथवा अछूत के रूप में माना जाता है । अशिक्षित तो छोड़िए शिक्षित वर्ग का एक बड़ा तबका आज भी बेटियों के पीरियड के बारे में खुलकर बात नही करते हैं । यह एक अजीब सी धारणा है । और यह अवधारणा बताती है कि हमारा समाज पूर्व से ही महिलाओं के प्रति कितना संजीदा रहा है । माहवारी महिलाओं के जीवन की एक सामान्य प्रक्रिया है यूँ समझिए कि जिस तरह से मल मूत्र का त्याग होता है ठीक उसी प्रकार माहवारी भी होती है फिर इसमें अछूत या इसके बारे में बात न करने जैसी सोच तो एक कुप्रथा व महिलाओं के प्रति गंदी, दूषित मानसिकता को ही दर्शाता है ।

आज भी देश प्रदेश के कई क्षेत्रों में बेटियों को माहवारी के दौरान घरों से बाहर रखा जाता है। उन्हें स्कूल नहीं जाने दिया जाता है । कहीं कहीं तो बेटियों/ महिलाओं को गौशालाओं में रखा जाता है जहां उन्हें विस्तर नहीं बल्कि धान की घास यानी पुआल के बिछौने पर सुलाया जाता है । दिमाग पर जोर देकर सोचिए जिन बच्चियों को एक कुप्रथा के नाम पर इस तरह प्रताड़ित किया जाता होगा उन्हें कितना बड़ा मानसिक आघात पहुंचता होगा । मुझे अपने बचपन की याद है हम भी ग्रामीण परिवेश से हैं । मुझे भी बहुत सालों बाद पता चला कि आखिर यह नौटंकी है क्या ? दरअसल गांव में जब भी किसी महिला या बेटी को माहवारी होती थी तो परिवार में अजीब से कश्मकश देखने को मिलती थी । बच्चे जब अपनी माँ , चाची, भाभी या बहिन को घर से बाहर देखते थे और फिर उन्हें घर के अंदर आने के लिए जिद्द करते तो बुजुर्ग उन्हें यह कहते हुए झिड़कते हुए समझाते थे कि तेरी माँ ने घास काटते हुए गलती से मरी हुई गाय की हड्डी को छू लिया था इसलिए वो अब तीन से चार दिनों तक घर के अंदर नहीं आ सकती है । 

ताज्जुब होता है कि ये सब मैंने भी अपनी आंखों से देखा

डॉ. सुमिता प्रभाकर, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं अध्यक्ष कैन प्रोटेक्ट फाउण्डेशन । Dr. SUMITA PRABHAKAR . YOUTH ICON DEHRADUN जिन बच्चियों को एक कुप्रथा के नाम पर इस तरह प्रताड़ित किया जाता होगा उन्हें कितना बड़ा मानसिक आघात पहुंचता होगा । मुझे अपने बचपन की याद है हम भी ग्रामीण परिवेश से हैं । मुझे भी बहुत सालों बाद पता चला कि आखिर यह नौटंकी है क्या ? दरअसल गांव में जब भी किसी महिला या बेटी को माहवारी होती थी तो परिवार में अजीब से कश्मकश देखने को मिलती थी । बच्चे जब अपनी माँ , चाची, भाभी या बहिन को घर से बाहर देखते थे और फिर उन्हें घर के अंदर आने के लिए जिद्द करते तो बुजुर्ग उन्हें यह कहते हुए झिड़कते हुए समझाते थे कि तेरी माँ ने घास काटते हुए गलती से मरी हुई गाय की हड्डी को छू लिया था इसलिए वो अब तीन से चार दिनों तक घर के अंदर नहीं आ सकती है ।

व कानों से सुना है । लेकिन खुशी है कि आज एक बड़ा तबका अब ऐसी कुप्रथा से छुटकारा पा चुका है । लेकिन अभी भी ऐसी सोच हमारे बीच समाज में मौजूद है, जिससे छुटकारा पाना या छुटकारा दिलाना बहुत जरूरी है । याद रखिये महिलाओं के साथ इस बर्ताव के लिए महिलाएं भी कम दोषी नहीं हैं । आखिर क्यों वह अपने आपको लाचार बनाकर रखती है । बेटियों को ऐसी कुप्रथाओं के खिलाफ जमकर आवाज उठानी होगी । आखिर कब तक यूँ ही अबला बनी रहोगी ? अपने अधिकारों, अपने मान-सम्मान के लिए नारी तुझे ही सब पर भारी पड़ना होगा ।

देश के हर एक नागरिक को अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा और इस तरह की कुरीतियों से अपनी माँ, बहिनों व बेटियों को छुटकारा दिलाना होगा । अन्यथा मुझे यह कहने में तनिक सा भी संकोच नहीं कि हम सबको शर्म आनी चाहिए अपने आज के इस बदलते भारत के युग में कि आज जहां हमारे पास हर प्रकार का वैज्ञानिक संसाधन व सोच मौजूद है उस दौर में भी हमारी माताएं व बेटियां मजबूर लाचार व शोषित बनी हुई हैं ।

सोच बदलने के साथ-साथ यह समझने की जरूरत है कि महिलाओं में माहवारी सृष्टि की एक सुंदर रचना का हिस्सा है । माहवारी बेटियों के विकास का द्योतक है वह बेटियों में होने वाले परिवर्तन का सूचक भी है । इसलिए अब सोच बदलिए और वैज्ञानिक नजरिये से देखिए और मानिए कि यह बेटियों के लिए वरदान है । जो कई बीमारियों से उनकी रक्षा भी करता है ।

यह आंकड़ा तो चौकाने वाला है :

डॉ. सुमिता प्रभाकर, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं अध्यक्ष कैन प्रोटेक्ट फाउण्डेशन । Dr. SUMITA PRABHAKAR . YOUTH ICON DEHRADUN जिन बच्चियों को एक कुप्रथा के नाम पर इस तरह प्रताड़ित किया जाता होगा उन्हें कितना बड़ा मानसिक आघात पहुंचता होगा । मुझे अपने बचपन की याद है हम भी ग्रामीण परिवेश से हैं । मुझे भी बहुत सालों बाद पता चला कि आखिर यह नौटंकी है क्या ? दरअसल गांव में जब भी किसी महिला या बेटी को माहवारी होती थी तो परिवार में अजीब से कश्मकश देखने को मिलती थी । बच्चे जब अपनी माँ , चाची, भाभी या बहिन को घर से बाहर देखते थे और फिर उन्हें घर के अंदर आने के लिए जिद्द करते तो बुजुर्ग उन्हें यह कहते हुए झिड़कते हुए समझाते थे कि तेरी माँ ने घास काटते हुए गलती से मरी हुई गाय की हड्डी को छू लिया था इसलिए वो अब तीन से चार दिनों तक घर के अंदर नहीं आ सकती है ।

एक अनुसंधान से पता चला कि दुनियाँभर में हर रोज 80 करोड़ बेटियों/ महिलाओं को माहवारी (पीरियड्स) होते हैं । जिनकी पूरी जिंदगी में औसतन 3 हजार दिन माहवारी में बीत जाते हैं ।
अब अगर भारत की बात करें तो ताज्जुब इस बात का होता है कि जब हम यह नारा देते नहीं थकते हैं कि पुरुष और महिला एक समान…. ठीक ऐसे ही दौर में एक आंकड़ा हम सबको और चौंका देता है । एक सर्वे के अनुसार पूरे भारत वर्ष में केवल 18% महिलाएं ही माहवारी के वक़्त पैड यूज करती हैं ।

डॉ. सुमिता प्रभाकर, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं अध्यक्ष कैन प्रोटेक्ट फाउण्डेशन । Dr. SUMITA PRABHAKAR . YOUTH ICON DEHRADUN जिन बच्चियों को एक कुप्रथा के नाम पर इस तरह प्रताड़ित किया जाता होगा उन्हें कितना बड़ा मानसिक आघात पहुंचता होगा । मुझे अपने बचपन की याद है हम भी ग्रामीण परिवेश से हैं । मुझे भी बहुत सालों बाद पता चला कि आखिर यह नौटंकी है क्या ? दरअसल गांव में जब भी किसी महिला या बेटी को माहवारी होती थी तो परिवार में अजीब से कश्मकश देखने को मिलती थी । बच्चे जब अपनी माँ , चाची, भाभी या बहिन को घर से बाहर देखते थे और फिर उन्हें घर के अंदर आने के लिए जिद्द करते तो बुजुर्ग उन्हें यह कहते हुए झिड़कते हुए समझाते थे कि तेरी माँ ने घास काटते हुए गलती से मरी हुई गाय की हड्डी को छू लिया था इसलिए वो अब तीन से चार दिनों तक घर के अंदर नहीं आ सकती है ।
डॉ. सुमिता प्रभाकर, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं अध्यक्ष कैन प्रोटेक्ट फाउण्डेशन । 

लेकिन सुखद बात यह भी है कि अब कई संगठन समाज में व्याप्त अनेक बुराईयों के खिलाफ बड़ी संजीदगी के साथ दबे, कुचले , पीड़ित शोषित वर्ग के साथ कदमताल कर उन्हें सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में बढ़-चढ़कर अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन भी कर रहे हैं । इन्हीं में से एक है “कैन प्रोटेक्ट फाउंडेशन” यह फाउंडेशन विगत कई वर्षों से महिलाओं की सेहत के लिए चिंतित है । महिला वर्ग स्वस्थ निरोगी रहे और उनके साथ सामाज में अन्याय न हो उसकी दिशा में भी फाउंडेशन अब बढ़-चढ़कर काम कर रहा है ।
8 मार्च यानी अंतराष्ट्रीय महिला दिवस और इस मौके पर कैन प्रोटेक्ट फाउंडेशन एक विशेष जागरूकता अभियान को आगे बढ़ाने में अपनी सामाजिक भूमिका निभा रहा है । फाउण्डेशन के संस्थापक अध्यक्ष डॉ0 सुमिता प्रभाकर ने बातचीत में बताया कि उन्होंने इस बार लड़कियों / महिलाओं की माहवारी यानी पीरियड्स को लेकर समाज में जागरूकता लाने की सख्त जरूरत है । डॉ0 सुमिता प्रभाकर बताती हैं कि यह बड़ी चिंता की बात है कि हिंदुस्तान की इतनी बड़ी आबादी में केवल 18% महिलाएं ही पैड के बारे में जानती हैं । उन्होंने तो यूटर्स के कैंसर के लिए माहवारी के वक़्त साफ सफाई का विशेष ध्यान न रखने को भी बड़ा कारक माना है । डॉ0 प्रभाकर ने कहा कि उनका फाउण्डेशन ने इस तरह के जागरूकता अभियानों को आगे बढ़ाने के प्रति दृढ़ संकल्प लिया है । खासकर महिलाओं को उनके सामाजिक अधिकारों के साथ उनके स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक करना उनका उद्देश्य है ।

© Shashi Bhushan Maithani Paras .

 

Shashi Bhushan Maithani Paras . Founder Youth icon Creative Foundation and rangoli andolan . Dehradun . Padmenदाग अच्छे हैं : - सोच बदलने के साथ-साथ यह समझने की जरूरत है कि #महिलाओं में #माहवारी #सृष्टि की एक सुंदर रचना का हिस्सा है । माहवारी #बेटियों के #विकास का द्योतक है वह बेटियों में होने वाले #परिवर्तन का सूचक भी है । इसलिए अब सोच बदलिए और #वैज्ञानिक नजरिये से देखिए और मानिए कि यह बेटियों के लिए #वरदान है । जो कई #बीमारियों से उनकी #रक्षा भी करता है । #शशि_भूषण_मैठाणी_पारस संस्थापक रंगोली आंदोलन समाजिक मुहिम यूथ आइकॉन Yi नेशनल अवार्ड 9756838527 7060214681
Shashi Bhushan Maithani Paras . Founder Youth icon Creative Foundation and rangoli andolan

 

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