उत्तराखंड में इन चेहरों से पड़ा है दिग्गजों पेशानी पर बल

Kingmaker : किंगमेकर की भूमिका में हो सकते हैं निर्दलीय

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* Shashi Bhushan Maithani ‘Paras’
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त्तराखंड विधानसभा 2017 का चुनाव परिणाम भले ही अभी 11 मार्च को आना हो लेकिन भाजपा और कांग्रेस ने सरकार गठन की कवायदें अभी से शुरू कर दी हैं। अपनी सीटों के हार-जीत के आंकलन के साथ ही दलों की निगाहें उन चेहरों की तरफ हैं जिन्होंने अपने दम पर चुनाव लड़ा और मतदान के बाद जिनके बारे में पाॅजिटिब रिपोर्ट सुनने को मिल रही है। ऐसे लगभग आधा दर्जन निर्दलीय जिनकी

उत्तराखंड में इन चेहरों से पड़ा है दिग्गजों पेशानी पर बल
उत्तराखंड में इन चेहरों से पड़ा है दिग्गजों पेशानी पर बल

जीत की संभावनाएं बताई जा रही हैं कांग्रेस और भाजपा के रडार पर हैं।

राज्य में अभी तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दल और निर्दलीय सरकार बनाने में खास रोल प्ले करते रहे हैं। मौजूदा कांग्रेस सरकार ने तो निर्दलीयों के सहारे ही कार्यकाल पूरा किया। अब चैथी विधानसभा के लिए हुए चुनाव भी कुछ इस ओर ही इशारा कर रहे हैं। इस चुनाव में करीब आधा दर्जन निर्दलीय प्रत्याशियों के जीत की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं। इसमें हरीश रावत सरकार के दो कैबिनेट मंत्री भी शामिल हैं। इन्हें कांग्रेस अपना मानकर चल रही है। हालांकि इनका रूख चुनाव परिणाम की सूरत के बाद ही तय हो सकेगा। इसके अलावा एक पूर्व महिला विधायक के भी जीत की संभावनाएं बताई जा रही हैं। जबकि तीन अन्य निर्दलीय प्रत्याशियों के जीत के दावे हो रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा के आला नेताओं विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से मिल रही रिपोर्टस के बाद निर्दलीयों को रडार पर ले लिया। उनसे विभिन्न माध्यमों से मेल जोल बढ़ाने के प्रयास भी शुरू हो गए हैं। जीत की संभावना वाले निर्दलीयों के खास समर्थकों तक कांग्रेस और भाजपा के आला नेताओं के खास लोगों ने कनेक्शन स्थापित कर दिया है। उक्त समर्थक निर्दलीयों को विभिन्न तरीकों से टटोलने भी लगे हैं। ताकि जरूरत पड़ने पर समर्थन लिया जा सकें। निर्दलीयों की संख्या बढी तो भाजपा बहुमत में आने से पहले ही ठिठर सकती है, ऐसे में उसे इन निर्दलीयों से समझौता करना ही पडेगा। खास बात ये है कि दलों के बजाए दलों के आला नेता उक्त काम को अपने स्तर से कर रहे हैं। ये काम धीरे-धीरे बोल कोई सुनना ले की तर्ज पर हो रहे हैं। करीब एक दर्जन सीटों पर निर्दलीयों ने कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों को जबरदस्त टक्कर दे रहे हैं। इसमें उक्त दोनों दलो के बागी प्रत्याशी शामिल हैं। दिग्गजों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो अपने से अधिक निर्दलीयों को मिलने वाले वोटों की संभावनाओं को टटोल रहे हैं। उत्तराखंड में विधानसभा की 70 सीटें हैं। जिनमें गढ़वाल रीजन में 41 और कुमाऊं की 29 विधानसभा सीटें शामिल हैं। इसमें भी गढ़वाल के मैदानी जिले हरिद्वार और कुमाऊं के उधमसिंह नगर में कुल मिलाकर 20 सीटें हैं। गढ़वाल, कुमाऊं में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों का बंटवारा होता रहा है। बसपा भी किंग मेंकर की भूमिका में रही है। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में बसपा को 7 सीटें मिली थी तो 2007 के दूसरे चुनाव में बसपा को सर्वाधिक 8 सीटें हासिल हुई थी। 2012 में बसपा को हरिद्वार में 3 सीटें पर जरूर सिमट गईं, लेकिन बसपा को करीब 12 फीसदी मत मिले थे। कम सीटों के बावजूद बसपा उत्तराखंड में एक किंगमेकर की भूमिका में रही है। इस बार के चुनाव में भी कुछ ऐसी ही स्थितियां बनती हुई दिखाई दे रही है। अब देखना जब ईवीएम खुलेंगी तो कौन से वो निर्दलीय प्रत्याशी होंगे जो किंग मेकर की भूमिका में नजर आएंगे।

राजनीति के ये खिलाड़ी जो मार सकते हैं मैदान
बिगाडेगें समीकरण या बदलेगी सियायत ?
आइऐ डालते हैं ऐसे ही नेताओं पर एक नजर-
उत्तराखंड विधानसभा 2017 का चुनाव परिणाम भले ही अभी 11 मार्च को आना हो लेकिन भाजपा और कांग्रेस ने सरकार गठन की कवायदें अभी से शुरू कर दी हैं। अपनी सीटों के हार-जीत के आंकलन के साथ ही दलों की निगाहें उन चेहरों की तरफ हैं जिन्होंने अपने दम पर चुनाव लड़ा और मतदान के बाद जिनके बारे में पाॅजिटिब रिपोर्ट सुनने को मिल रही है। ऐसे लगभग आधा दर्जन निर्दलीय जिनकी जीत की संभावनाएं बताई जा रही हैं कांग्रेस और भाजपा के रडार पर हैं। राज्य में अभी तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दल और निर्दलीय सरकार बनाने में खास रोल प्ले करते रहे हैं। मौजूदा कांग्रेस सरकार ने तो निर्दलीयों के सहारे ही कार्यकाल पूरा किया। अब चैथी विधानसभा के लिए हुए चुनाव भी कुछ इस ओर ही इशारा कर रहे हैं। इस चुनाव में करीब आधा दर्जन निर्दलीय प्रत्याशियों के जीत की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं। इसमें हरीश रावत सरकार के दो कैबिनेट मंत्री भी शामिल हैं। इन्हें कांग्रेस अपना मानकर चल रही है। हालांकि इनका रूख चुनाव परिणाम की सूरत के बाद ही तय हो सकेगा। इसके अलावा एक पूर्व महिला विधायक के भी जीत की संभावनाएं बताई जा रही हैं। जबकि तीन अन्य निर्दलीय प्रत्याशियों के जीत के दावे हो रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा के आला नेताओं विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से मिल रही रिपोर्टस के बाद निर्दलीयों को रडार पर ले लिया। उनसे विभिन्न माध्यमों से मेल जोल बढ़ाने के प्रयास भी शुरू हो गए हैं। जीत की संभावना वाले निर्दलीयों के खास समर्थकों तक कांग्रेस और भाजपा के आला नेताओं के खास लोगों ने कनेक्शन स्थापित कर दिया है। उक्त समर्थक निर्दलीयों को विभिन्न तरीकों से टटोलने भी लगे हैं। ताकि जरूरत पड़ने पर समर्थन लिया जा सकें। निर्दलीयों की संख्या बढी तो भाजपा बहुमत में आने से पहले ही ठिठर सकती है, ऐसे में उसे इन निर्दलीयों से समझौता करना ही पडेगा। खास बात ये है कि दलों के बजाए दलों के आला नेता उक्त काम को अपने स्तर से कर रहे हैं। ये काम धीरे-धीरे बोल कोई सुनना ले की तर्ज पर हो रहे हैं। करीब एक दर्जन सीटों पर निर्दलीयों ने कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों को जबरदस्त टक्कर दे रहे हैं। इसमें उक्त दोनों दलो के बागी प्रत्याशी शामिल हैं। दिग्गजों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो अपने से अधिक निर्दलीयों को मिलने वाले वोटों की संभावनाओं को टटोल रहे हैं। उत्तराखंड में विधानसभा की 70 सीटें हैं। जिनमें गढ़वाल रीजन में 41 और कुमाऊं की 29 विधानसभा सीटें शामिल हैं। इसमें भी गढ़वाल के मैदानी जिले हरिद्वार और कुमाऊं के उधमसिंह नगर में कुल मिलाकर 20 सीटें हैं। गढ़वाल, कुमाऊं में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों का बंटवारा होता रहा है। बसपा भी किंग मेंकर की भूमिका में रही है। 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में बसपा को 7 सीटें मिली थी तो 2007 के दूसरे चुनाव में बसपा को सर्वाधिक 8 सीटें हासिल हुई थी। 2012 में बसपा को हरिद्वार में 3 सीटें पर जरूर सिमट गईं, लेकिन बसपा को करीब 12 फीसदी मत मिले थे। कम सीटों के बावजूद बसपा उत्तराखंड में एक किंगमेकर की भूमिका में रही है। इस बार के चुनाव में भी कुछ ऐसी ही स्थितियां बनती हुई दिखाई दे रही है। अब देखना जब ईवीएम खुलेंगी तो कौन से वो निर्दलीय प्रत्याशी होंगे जो किंग मेकर की भूमिका में नजर आएंगे।

प्रीतम पंवार
धनोल्टी। पूरे पांच साल कंाग्रेस के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने वाले प्रीतम पंवार इस बार धनौल्टी विस सीट से निर्दलीय ही मैदान में उतरे हैं। यहां पर कांग्रेस ने हां-ना, हां-ना करते हुए आखिर में मनमोहन मल्ल को चुनाव मैदान में उतार ही दिया था। अगर चुनाव परिणामों की बात की जाए तो इतना तो तय है कि धनौल्टी सीट पर इस बार मुकाबला काॅफी करीबी रहने वाला है।

दिनेश धन्नै
टिहरी। 2012 में टिहरी सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान मे उतरे दिनेश धन्नै ने जीत दर्ज की। और रावत सरकार मंे कबीना मंत्री बनाये गए। लेकिन 2017 के विस चुनाव में एक बार फिर कंाग्रेस से खफा होकर उन्होने निर्दलीय ही चुनाव लडने का फैैसला किया है। जिससे दोनों ही पार्टीयों के लिए आगे की राह आसान नजर नही आ रही है। टिहरी में निर्दलीय दिनेश धन्नै कांग्रेस का नरेन्द्र चन्द्र रमोला तथा भाजपा के धन सिंह नेगी से कड़ा मुकाबला हुआ है।

आशा नौटियाल
केदारनाथ। केदारनाथ विधानसभा सीट में शैला रानी बीजेपी, मनोज रावत कांग्रेस, निर्दलीय आशा नौटियाल, निर्दलीय कुलदीप रावत में कड़ा मुकाबला दिखाई दे रहा है। यहां स्थिती बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किलों वाली बनी दिखाई दे रही है। आशा नौटियाल की जनसभाओं मंे उमडे हुए जनसैलाब को देखकर यही कहा जा सकता है कि बीजेपी और कांग्रेस के लिए इस बार राह आसान नहीं है।

ओमगोपाल रावत
नरेन्द्र नगर। नरेन्द्र नगर के पूर्व विधायक और भाजपा नेता ओमगोपाल टिकट काटे जाने के बाद निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे। यहां उन्होंने खुद के साथ अन्याय और बागी-दागी का मुद्दा बनाकर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की। पिछले 2 विधानसभा चुनावों में भी वह कांटे के मुकाबले में एक बार जीते और एक बार हारे हैं। कांग्रेस के हिमांशु बिल्जडवाण तथा भाजपा के सुबोध उनियाल पर निर्दलीय ओम गोपाल भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

रेनू बिष्ट
यमकेश्वर। कभी कांग्रेस का हाथ थामकर चलने वाली रेनू बिष्ट ने टिकट काटे जाने से नाराज होकर निर्दलीय ही चुनाव लडने का फैसला किया था। जगह-जगह की गई जनसभांओ और रैलियों मे उमडे जनसैलाब को देखकर कहा जा सकता है कि कहीं ना कहीं वे दूसरे प्रत्याशियों के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं। मतदान के बाद आ रहे रूझान भी भाजपा और कांग्रेस का बीपी बढाने का काम कर रहे हैं।

दिवाकर भटृ
देवप्रयाग। दिवाकर भटृ जो की उत्तराखडं की राजनीति में एक कदावर नेता के रूप मे जाने जाते हैं। लेकिन बीजेपी से टिकट काटे जाने से नाराज होकर वे देवप्रयाग सीट से निर्दलीय ही चुनाव लड रहे हैं। जहां तक इस सीट की बात है तो यहां पर मुकाबला त्रिकोणीय हो रखा है। मतदान के बाद चर्चाओं का बाजार गर्म है कि इस बार अन्य के मुकाबले दिवाकर की स्थिती मजबूत बताई जा रही है।

सूरतराम नौटियाल
गंगोत्री। गंगोत्री विधानसभा में भी त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला है। यहां भाजपा-कांग्रेस प्रत्याशियों को निर्दलीय प्रत्याशी सूरतराम नौटियाल ने कड़ी टक्कर दी है। गौरतलब है कि सूरतराम बीजेपी से टिकट की दावेदारी कर रहे थे लेकिन पार्टी ने पूर्व विधायक गोपाल रावत को टिकट दिया। जिससे खफा सूरतराम नौटियाल ने निर्दलीय ही चुनाव लडने का फैसला किया था। स्थानीय लोगों के अनुसार यहंा उनकी स्थिती मजबूत बताई जा रही है।

विनोद फोनिया
बदरीनाथ। बदरीनाथ से भाजपा के महेन्द्र प्रसाद भटट, कांग्रेस से राजेन्द्र सिंह भण्डारी, निर्दलीय विनोद फोनिया के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला है। बद्रीनाथ विधानसभा के चुनाव परिणामो में बड़े फेर बदल की संभावनाएं जताई जा रही हैं। विनोद फोनिया जिस वर्ग से हैं, वहां उनकी अच्छी मतदाता संख्या है। इस बार हार-जीत का अंतर काॅफी कम रहने की संभावना है।

शूरवीर सजवाण
देवप्रयाग में दिवाकर भट्ट की तरह ही निर्दलीय शूरवीर सजवाण की स्थिती भी मजबूत बताई जा रही है। कांग्रेस से टिकट कटने के बाद निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे शूरवीर सजवाण ने कांग्रेस के मंत्री प्रसाद नैथानी, तथा भाजपा के विनोद कंडारी क साथ ही निर्दलीय दिवाकर भट्ट को कड़ी टक्कर दी है।

आर्येन्द्र शर्मा
सहसपुर। सहसपुर में निर्दलीय आर्येन्द्र शर्मा पूरे चुनाव में राष्ट्रीय दलों के प्रत्याशियों के समीकरण बिगाड़ते हुए नजर आए। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय तथा भाजपा के निवर्तमान विधायक सहदेव पुण्डीर पर आर्येंद्र शर्मा भारी पड़ते नजर आए। राजनीतिक विशलेषकों की माने तो आर्येंद्र के चुनाव लड़ने का सीधा नुकसान कांग्रेस प्रत्याशी को उठाना पड़ा है।

संदीप गुप्ता
ऋषिकेश। ऋषिकेश में संदीप गुप्ता भाजपा के निवर्तमान विधायक प्रेमचंद अग्रवाल की जीत में रोडा साबित हो सकते हैं। संदीप गुप्ता के निर्दलीय खड़े होने का नुकसान भाजपा के साथ ही कांग्रेस प्रत्याशी राजपाल खरोला को भी उठाना पड़ा है।

मोहन काला
श्रीनगर। श्रीनगर विधानसभा में निर्दलीय मोहन सिंह काला इस बार राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस के गणेश गोदियाल तथा भाजपा के धन सिंह रावत पूरे चुनाव में भारी पड़ते दिखाई दिए हैं।

किशन भंडारी
डीडीहाट। डीडीहाट में किशन सिंह भण्डाोरी ने कांग्रेस के प्रदीप सिंह पाल तथा भाजपा के भारी भरकम नेता बिशन सिंह चुफाल की जीत की राह में रोडे डाल दिये हैं, यहां निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में किशन सिंह भण्डारी भारी भरकम सिद्व हुए हैं।
हरेन््द्र सिंह बोरा
लालकुआ। लालकुआ में हरेन््द्र सिंह बोरा निर्दलीय प्रत्योशी के रूप में उतरे हैं। यहां से कांग्रेस के हरीश चन्द्र दुर्गापाल तथा भाजपा के नवीन चन्द्र दुम्का पर निर्दलीय प्रत्याशी बोरा भारी सिद्व होते दिखाई दे रहे हैं।
भूपेश उपाध्यााय
कपकोट। कपकोट में भूपेश उपाध्यााय कांग्रेस तथा भाजपा के प्रत्या्शी पर भारी सिद्व हुए हैं, भुपेश उपाध्याय भाजपा के बागी बनकर कपकोट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े। भुपेश यहा से भाजपा का प्रबल दावेदार थे। लेकिन भाजपा ने पूर्व कैबिनेट मंत्री बलवंत सिंह भोर्याल को टिकट दिया।

प्रमोद नैनवाल
भूपेश उपाध्याय की तरह ही रानीखेत से प्रमोद नैनवाल ,डीडीहाट से किशन सिंह भंडारी, गंगोलीहाट से खजान गुडडू और काशीपुर से राजीव अग्रवाल के साथ ही कालाढुंगी से हरेन्द्र दरमवाल बागी बन चुनाव मैदान में थे। सभी अपनी-अपनी विधानसभा क्षेत्र से जीतने के दावे कर रहे हैं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो ये कुछ ऐसे निर्दलीय प्रत्याशी हैं जो 2017 के विधानसभा चुनाव में अहम रोल अदा करने वाले हैं। जिनमें से कुछ कद्दावर नेता की छवि रखते हैं तो कुछ नेताओं को अपने छेत्र में अच्छी पकड होने का लाभ भी मिल सकता है। खैर भले ही चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं लेकिन नेताओं के साथ-साथ आम जनता भी 11 मार्च का बेस्रबी से इंतजार कर रही है और इतंजार इस बात का भी रहेगा की क्या ये ग्यारह निर्दलीय प्रत्याशी अपनी सीटों पर जीतते हैं या दूसरों का खेल बिगाडते हैं ।

By Editor

One thought on “Kingmaker : किंगमेकर की भूमिका में हो सकते हैं निर्दलीय”
  1. श्रीमान शशी भूषण मैठ़ाणी साहब जी इन सब बातों का निचोड़ यही है कि राजनीति बडी कुत्ती चीज है।

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