Logo Youth icon Yi National Media HindiMahaghotala : पिटकुल बना घपले-घोटालों का अड्डा ! श्रीनगर-काशीपुर ट्रांश्मिशन लाइन में हुआ करोड़ो का खेल . 

आशीष नेगी

देहरादून, (यूथ आइकाॅन)। पावर ट्रांसमिशन कारपोरेशन लिमिटेड यानि पिटकुल में घपले-घोटाले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। एक के बाद एक सामने आ रहे घोटालों से विभाग की छवि लगातार धूमिल हो रही हैं। यही भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की बात करने वाली त्रिवेन्द्र सरकार पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। यह घोटाला अंजाम दिया गया श्रीनगर से काशीपुर तक 400 किलोवाट की ट्रांश्मिशन लाइन बिछाने के नाम पर। गौरतलब है कि गढ़वाल मंडल के श्रीनगर से काशीपुर तक 400 किलोवाट की ट्रांश्मिशन लाइन बिछानी थी।  इसके कुल बजट का 90 फीसदी विश्व बैंक और 10 फीसदी राज्य सरकार को देना था। पिटकुल ने ट्रांश्मिशन लाइन बिछाने के लिए मुम्बई की ज्योति स्ट्रक्चर कम्पनी से सर्वे करवाया जिसने 152.8 किमी लंबी लाइन बनाने की सलाह दी। पिटकुल ने कंपनी को 57 लाख रुपये का भुगतान कर दिया जिसके बाद एक कोरियन कंपनी मैसर्स कोबरा को ये लाइन बिछाने का काम दिया। लेकिन अनुबंध करने के बाद मैसर्स कोबरा ने सबसे पहला काम पुराने सर्वे को खारिज करने का किया और खुद नया सर्वे किया। इस सर्वे में ट्रांस्मिशन लाइन की लंबाई 190 किलोमीटर बताई गई जिसमें से करीब 25 किमी लाइन उत्तरप्रदेश की सीमा से होकर गुजरनी थी। लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार से इस संदर्भ में कोई बातचीत तक नही की गई हालांकि केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा पिटकुल को स्पष्ट निर्देश थे कि ये लाइनें उतराखंड के ही अंदर ही बननी हैं। इससे 3.47 करोड़ प्रति किलोमीटर की दर से यह करीब 560 करोड़ रुपये की परियोजना की अनुमानित लागत बढ़कर 1000 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। पिटकुल ने मैसर्स कोबरा को काम शुरू करने के लिए अक्टूबर 14 में ब्याज मुक्त 53 करोड़ रुपये का भुगतान भी कर दिया। अनुबंध के तहत कंपनी को काम शुरू कर 900 दिन के अंदर पूरा करना था लेकिन अब तक एक पत्थर भी नहीं लगाया गया। सिर्फ यही नहीं कंपनी को किए गए भुगतान का कोई हिसाब भी पिटकुल को नहीं मिला है। अगर पिटकुल यह पैसा बैंक में रखता तो करीब करीब दो साल में लगभग आठ करोड़ रुपये ब्याज से ही कमा कर अपना राजस्व को बढा सकता था। इस पूरे घोटाले में तत्कालीन डीजीएम विकास शर्मा की भूमिका पर सवाल खड़े हो हुए हैं। विकास शर्मा ने श्रीनगर से काशीपुर जाने वाली लाइन का सर्वे एक ऐसी कम्पनी से कराया जिसने बाकायदा पहाड़ की भौगोलिक विषम परिस्थितियों के समझे बगैर गूगल के जरिए पूरा सर्वे कर दिया और तत्कालीन डीजीएम विकास शर्मा को सर्वे के कागज सौंप दिए। जिसके एवज में विभाग की ओर से विकास शर्मा ने सर्वे करने वाली कंपनी को 57 लाख रूपये का भुगतान भी कर दिया गया, लेकिन जब इस सर्वे की हकीकत सामने आई तो अधिकारियों के पैरो तले जमीन खिसक गयी ओर पूरा सर्वे ही फर्जी करार दे दिया गया लेकिन उसके बावजूद भी विकास शर्मा पर कोई अहम कार्रवाई नहीं हो पायी और इस सर्वे के आधार पर कोबरा नाम की कंपनी को जब बिजली की लाइन डालने का काम दिया गया तो पूरा वक्या सामने आया कि जिस गूगल के अधार पर सर्वे किया गया उसमें बकायदा स्नो जौन, टाइगर रिजर्व, राजाजी नेशनल पार्क और जिम कार्बेट पार्क के साथ ही कई ऐसे वाक्ये थे जो चैंकाने वाले थे। कहीं-कही एक ही स्थान पर 12 टावर लगाने का सर्वे था जो पूरे तरीके से फर्जी था। इस बिजली की लाइन का काम करने वाली कोबरा नाम की कंपनी को ये काम तीन साल पहले 560 करोड़ में पूरा करना था लेकिन जो सर्वे था उसके मुताबिक ये काम एक हजार करोड़ में भी पूरा नहीं हो सकता था और कंपनी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए अगर सही सर्वे कराया गया होता तो श्रीनगर-काशीपुर  लाइन का कार्य तय दर पर पूरा हो जाता लेकिन कोबरा नाम की कंपनी ने काम इस दर पर काम करने से मना कर दिया और जो आज तक पूरा नहीं हो पाया। इस पूरे कार्य को करने में नई कंपनियां अब 1000 करोड़ की दर पर करने की बात कह रही हैं। अब यह अनुदान की राशि तय समय सीमा मार्च 2016 तक कार्य पूर्ण न होने के कारण ए0डी0बी0 द्वारा वापस ले ली गयी है। इससे अब यह 1000 करोड का घोटाला हो गया है। जो विभाग को इतना बड़ा घाटा देने वाले अधिकारी विकास शर्मा के खिलाफ विभागीय जांच अधिकारियों ने बकायदा एफआईआर दर्ज करने की संस्तुति भी दी लेकिन शासन में बैठने वाले अधिकारियो में इस आरोपी अधिकारी का इतना रसूख है कि कोई भी उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करने की हिम्मत जुटा भी इस पूरे मामले पर लीपापोती ही करते नजर आये।

हमने आखिरी मौका देते हुए काम शुरू करने के लिए मैसर्स कोबरा को तीन महीनों का समय दिया था कि लेकिन वह काम शुरू नहीं कर पाई जिसके बाद हमने बैठक कर निर्णय लिया कि या तो इसी कंपनी को रिस्क एंड कॉस के आधार पर काम दिया जाएगा या फिर सेकेंड बीड करने वाली टाटा कंपनी को इसी रेट पर ऑफर किया जाएगा। अगर दोनों ही कंपनियों इस परियोजना को करने में अपनी असमर्थता दिखाते हैं तो फिर इसके लिए रिटेंडरिंग की जाएगी। इसी के साथ ही उन्होनें कहा कि 106 करोड़ रुपये मैसर्स कोबरा कंपनी से वसूल लिए गये है।
एसएन वर्मा, प्रबंध निदेशक, पिटकुल
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By Editor