Logo Youth icon Yi National Media HindiOur schools are playing big role to stop migration of Hills. गणेश कुड़ियाल की खास रिपोर्ट : पर्वतीय इलाकों के निजी शिक्षण संस्थानों को सरकारी मद्द की दरकार, पलायन रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं कई शिक्षण संस्थान । 

 गणेश कुड़ियाल
गणेश कुड़ियाल

टिहरी, (यूथ आइकाॅन) Youth icon Yi Media.

पर्वतीय इलाकों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था की हालत के कारण जब बड़ी संख्या में छात्र इन से मुंह मोड़ने लगे और शहरों की ओर पलायन करने लगे तो समाज के कुछ जागरूक प्रहरियों ने पर्वतीय इलाकों में स्कूल खोल वहां बच्चों को शिक्षा देने का काम शुरू किया। और शहरों के अंग्रेजी स्कूलों की तरह ही शिक्षा का पाठयक्रम रखा। यही नहीं कई पर्वतीय स्कूलों में फीस भी इस तरह रखी गई की गरीब से गरीब बच्चा शिक्षा ले सके। यह कहना भी गलत न होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले प्राइवेट स्कूल जो कि वास्तव में सामाजिक कार्य करने के साथ ही लम्बे समय से पलायन रोकने में रीढ़ का कार्य कर रहे है।
पहाड़ो के स्कूल आज पलायन और सरकारी नीतियों की दोहरी मार झेलते हुये स्वयम का अस्तित्व तलाश रहे हैं जो कि बहुत ही विड़म्बना का विषय है। जबकि एक सरकारी अध्यापक के वेतन के बराबर उतना ग्रामीण निजी स्कूलों के डेढ दर्जन अध्यापको की आजिविका साक्ष्य मात्र हैं। इन विपरीत परिस्थितियो में भी अपनी मातृभूमि गढ़देश की सच्ची समाज सेवा के बीच पलायन को रोकने हेतू बिना कुछ परवाह किये सच्चे मन से एक देश भक्त की भांति डटे हुये अपना सर्वोच्च दे रहे हैं। सरकार को चाहिये दुर्गम-सुगम स्थानांे मंे चलने वाले विघालयांे हेतू अपनी अलग-अलग नीतियाॅं स्पष्ट करे ताकि जो दुर्गम विधालयों को कोई व्यवधान ना हो और वे अच्छी से अच्छी शिक्षण व्यवस्थाये दे सके सुगम क्षेत्रो के प्रवेश शुल्क तथा दुर्गम क्षेत्रो के प्रवेश शुल्क में कही पर भी कोई समाजस्य नही है अपितु जितना कहीं पर मासिक शुल्क लिया जाता है उतने के एक तिहाही ही प्रवेश शुल्क दुर्गम विद्यालयों में मात्र छात्रों की अच्छी सुविधा हेतू लिया जाता है। जिसमें की विद्यालय मान्यता से लेकर फर्नीचर तथा अन्य कई प्रकार के खर्चों का वहन किया जाता है जबकि मासिक शुल्क से तो अघ्यापको का वेतन भी पूर्ण उपलब्घ नहीं हो पाता है जहाॅं सरकार को इन पलायन के सिपाहियों को सुविधायें उपलब्घ करवानी चाहिये, वहीं वह इन पर लगाम लगाने की बात कर रही है। सरकार एक तरफ तो अपने 100 दिन के कार्यकाल को सफल बता कर जश्न मना रही हैं। वहीं सरकार इन स्कूलों की लगाम कसने की बात कह कर स्थानीय बच्चों को शिक्षा के लिए पलायन करने के लिए मजबूर कर रही है। मेरा प्रश्न हैं उत्तराखण्ड़ सरकार से क्या फर्नीचर मुक्त विधालयों में इन विद्यालयो के नाम नहीं होने चाहिये जबकि ये पलायन रोकने हेतू अपना सर्वोच्च प्रस्तुत करते आ रहे है वास्तव में अगर सरकार को पलायन की दिशा में कार्य पर विश्वास रखती है तो इन्हे इन विद्यालयों के प्रति अपना दृष्टि कोण बदलना ही होगा। अगर सचमुच सरकार का ध्यान पलायन की तरफ है तो इन विद्यालयों के प्रति अपना रूख साफ करना होगा। गौरतलब है कि पिछली कांग्र्रेस शासन काल के दौरान साल 2014 में पर्वतीय क्षेत्रों उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निवेश के लिए लोगों से आग्रह किया था। चूंकि मंशा प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में निवेश को आकर्षित करने की थी, इसलिए उसने विवि खोलने के निर्धारित मानकों में ढील दी गई। इसका शासनादेश जारी हुआ। मगर सरकार का ये प्रस्ताव निवेशकों को जमा नहीं। शासन में एक अदद प्रस्ताव तक नहीं पहुंचा। बड़ा सवाल यह कि क्या सरकार पर्वतीय क्षेत्रों के छात्रों के भविष्य को लेकर चिंतित है? क्या वह यह सोच रही है कि प्राइवेट विवि खुलने से पहाड़ी छात्रों को क्वालिटी एजुकेशन मिल सकेगी? अगर ऐसी मंशा है, तो फिर इस पर भी सवाल है क्योंकि इस प्रदेश में इतने जनपद नहीं जितने विश्वविद्यालय हैं। पूरे सूबे में केंद्रीय विश्वविद्यालय से लेकर प्राइवेट विश्वविद्यालय की संख्या 17 है। गढ़वाल विवि से ही 154 राजकीय, शासकीय, निजी विवि से संबद्ध है। वो पहाड़ हो या मैदान सरकारी क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, एनआईटी के अलावा तहसील व विस स्तर तक पॉलीटेक्निक कॉलेज, आईटीआई तक खोले जा रहे हैं। इन सभी संस्थानों की हकीकत किसी से छुपी नहीं हैं। खासतौर पर उन उच्च शिक्षण संस्थानों की जो पर्वतीय क्षेत्रों में हैं। सरकार के ही अपने कॉलेजों में शिक्षकों और गैर शिक्षकों के सैकड़ों पद खाली हैं। पॉलीटेक्निक कॉलेजों में ट्रेड हैं पर उन्हें पढ़ाने वाले नहीं हैं। पहाड़ तो छोड़िये राजधानी देहरादून में सेंटर फॉर एक्सलेंस के नाम से खोले गए दून विवि की व्यथा किसी से छुपी नहीं हैं जिसे दाखिले के लिए छात्रों के लाले पढ़ गए हैं। गढ़वाल में एक विवि था, उसे केंद्र की झोली में डाल दिया गया। कुमाऊं विवि का भी केंद्रीयकरण की तैयारी है। जाहिर है कि इन कमियों और खामियों का खामियाजा छात्रों को ही भुगतना पड़ रहा है। सरकार किसी की भी रही हो पर ये कुछ ऐसे तथ्य हैं जो किसी भी सरकार से छिपे नहीं हैं। अगर सरकार छात्रों के भविष्य को लेकर गंभीर होती तो कॉलेजों में शिक्षकों की कमी को दूर करती। सवाल उठ रहा है कि जब सरकार अपने संस्थानों को कायदे चला पाने में नाकाम है तो फिर एक निजी निवेशक के निवेश को लेकर सरकार इतनी आश्वस्त क्यों है? वह कौन सा फायदा है जिसे हासिल करने के लिए निवेशक पहाड़ में करोड़ों रुपये निवेश को तैयार हो जाएगा? जिन निवेशकों ने पूर्ववर्ती सरकारों की बात मानकर प्राथमिक और हायर एजुकेशन के स्कूल पर्वतीय इलाकों में खोले हैं आज कई निजी स्कूल बंदी की कगार पर हैं। इस लिए निजी स्कूलों के संचालक भी सरकार से गुहार लगाते हुए नजर आ रहे हैं कि उनके बारे में भी कुछ सोचा जाय।
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By Editor