Yahan si baat aur kahan :यहाँ रुनझुन पायल सी बजती है जिन्दगि । कभी क्रोध तो कभी प्यार, कभी खुशी तो कभी श्रृंगार, बस कुछ ऐसा ही है यहां का जीवन । youth icon Yi .Media

Yahan si baat aur kahan :यहाँ रुनझुन पायल सी बजती है जिन्दगि । कभी क्रोध तो कभी प्यार, कभी खुशी तो कभी श्रृंगार, बस कुछ ऐसा ही है यहां का जीवन । 

 

सच कहें तो यहां की उदासियाँ भी किसी समाधिस्थ भाव मे बैठे योगी सी है, जिन्हें आसानी से गले लगाया जा सकता है, इनका अपना नशा है, बस कहीं भी बैठिए और बिना दिमाग दौड़ाए डूबते चले जाइये मन के निर्जन में इन उदासियों का उत्सव मनाने,महसूस कीजिये इन उदासियों को जो बहुत ही गहरी धंस जाती है हमारे भीतर, खुशियां तो सतही होती है पल भर में छू मंतर , लेकिन

लेख : आलोक नौटियाल (शिक्षक) कर्णप्रयाग , चमोली

मन के कदमों से चल कर अगर जिन्दगि को खोजा जाय, तो निःसंदेह पहाड़ों से उपयुक्त कोई स्थान नहीं , यहां की संस्कृति में, परंपराओं में, तीज-त्योहारों और मेलों में इसकी संपूर्णता की झलक मिलती है । इसके अर्थशास्त्र और भूगोल को आसानी से पढ़ा जा सकता है , समझा जा सकता है, बशर्ते इसे मन से पढ़ा जाय ,दिमाग से नहीं, क्योंकि दिमाग की कितनी भी तारीफ कर लें, भावनाएं हमेशा प्रबल होती है और इन्हीं भावों की गंगोत्री मन से फूटती है। यहां प्रभुरचित कलाकृतियां कभी परीक्षा लेती हैं तो कभी उपहार देती है, कभी क्रोध तो कभी प्यार , कभी खुशी तो कभी श्रृंगार, बस ये समझ लीजिए यहां का जीवन बहुत ही आह्लादकारी है , यहां खुशियां भी है और उदासियाँ भी,,सच कहें तो यहां की उदासियाँ भी किसी समाधिस्थ भाव मे बैठे योगी सी है, जिन्हें आसानी से गले लगाया जा सकता है, इनका अपना नशा है, बस कहीं भी बैठिए और बिना दिमाग दौड़ाए डूबते चले जाइये मन के निर्जन में इन उदासियों का उत्सव मनाने,महसूस कीजिये इन उदासियों को जो बहुत ही गहरी धंस जाती है हमारे भीतर, खुशियां तो सतही होती है पल भर में छू मंतर , लेकिन अस्थि मज्जू तक घुस चुकी उदासियाँ आपको बिना शर्त प्रेम करती हैं , ऐसा प्रेम जो आपको बिना शर्त मिलता है, अपने कोमल स्पर्श से आत्मा को सहलाती ये उदासियाँ कभी कभी जीवन जीने का सलीका सीखा जाती हैं,,असभ्य हो चुकी सभ्यता को इन उदासियों से सीखना होगा, पर विडंबना तो देखिए, इस आधुनिक हो चुकी स्वार्थी सभ्यता में इसके दोगलेपन का आचरण स्पष्ट झलकता है, इसका पोषण और नींव ही प्रकृति की नैसर्गिक प्रकृति को बदल कर खड़ी की गई है, मन लज्जित हो जाता है , जब प्रकृति के विनाश की कीमत पर हम विकास हासिल करने की अनैतिक चेष्टा करते हैं , इससे सामना होते ही लगता है जैसे कामनाओं के ज्वार से भरी देह की पलकें , लज्जा से झुक गयी हों ,,सच मानियेगा इसे सजाने संवारने और सहेजने के जितने भी

Yahan si baat aur kahan :यहाँ रुनझुन पायल सी बजती है जिन्दगि । कभी क्रोध तो कभी प्यार, कभी खुशी तो कभी श्रृंगार, बस कुछ ऐसा ही है यहां का जीवन । youth icon Yi .Media
यहाँ रुनझुन पायल सी बजती है जिन्दगि । कभी क्रोध तो कभी प्यार, कभी खुशी तो कभी श्रृंगार, बस कुछ ऐसा ही है यहां का जीवन । 

डिजायनर सेमिनार और बड़ी बड़ी वैश्विक गोष्ठियां होती हैं , ये सब हमारी स्वार्थी सभ्यता के रेशमी पैंतरेबाजी मात्र हैं ।

आप सभी विद्धवान साथियों का हृदय की गहराई से आभार जो मेरी भाव विचार यात्रा के सहयात्री बने, ये किसी बौखलाए एकांतवासी का एकालाप मात्र है 😂😂 ,,,,,मिलेंगे फिर कभी , एक नए एपिसोड के साथ, आज का दिन तो हम इन उदासियों के नाम किये देते हैं ……।

सर्वाधिकार सुरक्षित : आलोक नोटियाल

 

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