Ye kaisa dard : पत्रकार तो पत्रकार है भाई…… मौतें एक जैसी, फिर संवेदनायें अलग-अलग क्यों

Satish Lakhera
Satish Lakhera

कल दिल्ली में मंडी हाउस लेकर जंतर मंतर तक गौरी लंकेश के हत्यारों को पकड़ने की मांग को लेकर 1 मार्च निकाला गया, जिसमें वाम दलों के साथ अनेक पत्रकार शामिल थे । एक माह बीतने को आया गौरी लंकेश के हत्यारे अभी तक नहीं पकड़े गये जबकि हाल ही में कर्नाटक के एक मंत्री ने बयान भी दिया था कि लंकेश के हत्यारों को पहचाना जा चुका है। इस पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर दबाव बनाया जाना चाहिए था किन्तु गौरी लंकेश की आड़ में कर्नाटक सरकार को घेरने के बजाय सोची समझी रणनीति के तहत मोदी सरकार, भारतीय जनता पार्टी और हिंदुत्ववादी धारा को निशाने पर लिया जा रहा है।

हत्या किसी की भी हो निंदनीय है ,गौरी लंकेश बाम पंथी धारा की प्रचारक थी और साथ ही एक कन्नड़ पत्रिका का सम्पादन करती थी। वह पत्रकार भी थी इसलिए उनकी हत्या के तुरंत बाद पूरे देश में पत्रकारों ने हत्या की निंदा की, टीवी चैनलों ने प्रमुखता से इस मुद्दे को उठाया और एक तरफा मोदी सरकार को निशाने पर ले लिया। “शल्य” धारा के बुद्धिजीवी, रुदाली गैंग, अवार्ड वापसी गिरोह ने बिना जांच के हिंदूवादी कातिल ढूंढ भी लिए। बेशर्मी की हद तब हो गई जब कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक में हुई हत्या के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उल्टे केंद्र सरकार की विचारधारा को निशाने पर ले लिया।

इन सारे चरणों को जोड़ने की आवश्यकता है कि किस तरह पूरे देश के पत्रकारों को ट्रैप कर लिया गया। उत्तराखंड के सुदूर गैरसेण जैसे स्थानों में भी गौरी लंकेश हेतु शोक सभा आयोजित की गई। हत्यारे तत्काल पकड़े जाने चाहिए, धारा विशेष के पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर एन्टी मोदी टाइप लम्बे-चौड़े आलेख लिखे। किन्तु उनका राज्य की कांग्रेस सरकार को बरी करना समझ से परे है। स्वाभाविक है पत्रकारों के बीच में अपनी बिरादरी के साथी के लिए संवेदना होना, भले ही वह उनकी परिचित हो या ना हो, उसका लेख उन्होंने कभी पढ़ा हो या ना हो, वह पत्रकारिता भी करती थी। अभी तक हत्यारों का न पकड़ा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

पत्रकारों के ट्रैप होने के विषय पर पुनः लौटता हूँ । गौरी लंकेश की हत्या के बाद 20 सितंबर 2017 को त्रिपुरा में 28 वर्षीय युवा पत्रकार शांतनु भौमिक की धारदार हथियार से निर्मम हत्या कर दी गई । त्रिपुरा में वामपंथी सरकार है, लंबे समय से माणिक सरकार वहां के मुख्यमंत्री हैं। शांतनु स्थानीय न्यूज़ चैनल दिन-रात के संवाददाता थे और एक प्रदर्शन को कवर करने त्रिपुरा के मानदायी क्षेत्र में गए थे। कम्युनिस्ट पार्टी की जनजाति शाखा TRUGP और वहां के ही एक संगठन IPFT के बीच हुई झड़प के बाद हो रहे आंदोलन को कवर करने हेतु शान्तनु भी वहां मौजूद थे। हमलावरों ने बेरहमी से शान्तनु के सिर पर वार किया और पुलिस के सामने ही उसे अगवा कर लिया। दो घंटे बाद उनकी लाश पुलिस को मिली। शान्तनु पर्वतीय क्षेत्र में काम कर रहा पत्रकार था। हिमालयी क्षेत्र के पत्रकारों की परिस्थितियां और चुनौतियां समान होती है। कम से कम हिमालयी क्षेत्र के पत्रकारों को उनकी नृशंस हत्या पर संवेदना प्रकट करनी थी जो कि कहीं दिखाई नहीं दी। हो सकता है इक्का-दुक्का संगठनों ने शान्तनु को याद भी किया होगा।

पत्रकारों ने गौरी लंकेश की तरह शान्तनु के लिए संवेदना व्यक्त नहीं की। क्या वह छोटा पत्रकार था? क्या उसकी पत्रकारिता पर संशय था? वह तो खालिश श्रमजीवी पत्रकार था, ड्यूटी करते शहीद हुआ। फिर दिक्कत क्या थी उसे श्रद्धांजलि देने में। हां ! जरूर दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में शांतनु को लेकर एक रस्मी शोकसभा जरूर हुई क्योंकि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और उसके अध्यक्ष गौतम लाहिड़ी इस बात को लेकर निशाने पर थे कि गौरी लंकेश के लिये आयोजित पत्रकारों की शोक सभा कम्युनिस्टों की शोकसभा में कैसे बदल गई थी। उस शोक सभा में मंच पर कम्युनिस्ट नेता डी राजा और कन्हैया कुमार थे। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने शांतनु को श्रद्धांजलि तो दी, किंतु उंगलियों में गिने जाने लायक संख्या में पत्रकार मौजूद थे ऐसे में सवाल तो खड़े होते ही हैं वे “पत्रकार” कहाँ गायब थे।

शान्तनु की शहादत के ठीक चौथे दिन चंडीगढ़ के मोहाली में वरिष्ठ पत्रकार केजे सिंह की हत्या हो गई, साथ में हत्यारों ने उनकी वृद्ध मां की भी हत्या कर दी थी। यह हत्या लूट के इरादे से नहीं थी, क्योंकि उनकी मां के शव के पास मिले बैग में रखे पच्चीस हजार रुपये हत्यारों ने नहीं लूटे और न ही केजे सिंह की सोने की चेन अंगूठी को हाथ लगाया । के जे सिंह चंडीगढ़ पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार थे, ट्रिब्यून के समाचार संपादक थे टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के वरिष्ठ संवाददाता और समाचार संपादक रहे थे । उनके निधन पर भी केवल चंडीगढ़ प्रेस क्लब ने औपचारिक तौर से शोक सभा आयोजित की। शांतनु भौमिक और केजे सिंह गौरी लंकेश से अलग कैसे थे।ये दोनों तो पूर्णकालिक पत्रकार थे, जबकि गौरी लंकेश शौकिया पत्रकार थी, उनके ट्वीट उनके लेखन से भी पता चलता है कि वह एक धारा विशेष की समर्थक और एक धारा विशेष की घोर विरोधी थी। उनके हत्या को पूरे देश में पत्रकारों और पत्रकारिता पर हमला बताया गया था, शान्तनु और केजे सिंह उतने ही उपेक्षित रहे।

मोदी सरकार के खिलाफ वातावरण बनाने वाले वामपंथी धारा के मीडिया सिंडिकेट ने सारे पत्रकार जगत को प्रभावित करके अपने साथ खड़ा कर दिया। ध्यान देने योग्य है कि पूर्व में पत्रकारिता धर्म निभाते हुए कितने पत्रकार हताहत हुए? क्या हर शहीद पत्रकार के लिये समान संवेदना व्यक्त होनी चाहिये या अलग-अलग?

हाल ही में केरल में एक वरिष्ठ पत्रकार संजीव गोपालन जो कि केरल कौमुदी के संवादाता हैं, आधी रात में केरल पुलिस ने उनके घर मे घुसकर उनकी पत्नी और बच्चों के सामने संजीव को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया। पुलिस के जाने के बाद ही पड़ोसी उन्हें अस्पताल ले जाने का साहस जुटा पाये। केरल में भी त्रिपुरा की तरह वामपंथी सरकार है। मुख्यमंत्री विजयन, जिनके कार्यकाल में केरल में राजनैतिक हत्याओं की बाढ़ सी आ गयी है। स्वयं मुख्यमंत्री पर एक संघ कार्यकर्ता की हत्या के आरोप लगे हैं। संघ भाजपा के लगभग एक सौ बीस कार्यकर्ताओं की केरल में हत्या हो चुकी है।

पत्रकार संजीव पर पुलिस के हमले का मतलब समझा जा सकता है कि कम्युनिस्ट सरकार के इशारे पर यह सब हुआ। अन्य पत्रकारों को भी इशारा था कि सरकार के खिलाफ लिखने पर संजीव जैसा हश्र हो सकता है । एक तरफ कम्युनिस्ट शासित प्रान्तों में बर्बरता से मौत के घाट उतारे जा रहे या घायल किये जा रहे पत्रकारों पर चुप्पी और वामपंथी प्रचारक और पत्रकार गौरी लंकेश पर एक “विशेष” अभियान समझ से परे है। हर जीवन महत्वपूर्ण है, हर हत्या और हिंसा निन्दनीय है। मगर संवेदनाओं में भेदभाव भी सोचनीय है। कम से कम पत्रकारों में अपनी ही बिरादरी के बीच खाई होना और किसी मौत पर अति द्रवित होना और किसी मौत पर अति उदासीनता होना शेष समाज के लिये समझ से परे है क्योकि वह सभी पत्रकारों को समान और सम्मान की दृष्टि से देखता है।

By Editor

2 thoughts on “Ye kaisa dard : पत्रकार तो पत्रकार है भाई…… मौतें एक जैसी, फिर संवेदनायें अलग-अलग क्यों”
  1. दुर्भाग्य से अधिकांश पत्रकार सत्ता के पुजारी हो गए है । सत्ता बदलते ही उनके देवता भी बदल जाते हैं।
    मौत तो मौत है चाहे किसी की भी क्यों न हो । पर आम आदमी की मौत मौत नही होती ।

  2. बहुत सटीक और व्यवस्था पर करारी चोट मारने वाला आलेख

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