आज का युवा .. अच्छी पढाई से कुर्सी पा सकते हैं, लेकिन उत्कृष्टता या लीडरशिप नहीं ! – शशि भूषण मैठाणी “पारस” एक दिन पहले बड़ी धूमधाम से महान वैचारिक व अध्यात्मिक संत स्वामी विवेकानंद जी की 157वीं जयंती मनाई गई . दुनियांभर में उनके अनुयायीयों व समस्त भारतवासीयों ने उनके महान विचारों को आत्मसात कर व उनके आदर्शों पर आगे बढ़ने की प्रतिज्ञा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी दोहराई होगी . मैं भी उस रस्म को निभाते हुए सर्वप्रथम स्वामी विवेकानंद जी को उनकी 157वीं जयंती पर याद कर उन्हें प्रणाम करता हूँ और उनके आदर्शों पर चलने का प्रण लेता हूँ . SHashi Bhushan Maithani Paras . Editor youth icon media . Youth icon national award . Youth day Swami Vivekanand ji । Dehradun । Uttarakhand

Youth icon yi media logo . Youth icon media . Shashi bhushan maithani paras

आज का युवा .. अच्छी पढाई से कुर्सी पा सकते हैं, लेकिन उत्कृष्टता या लीडरशिप नहीं !

– शशि भूषण मैठाणी “पारस”

 

एक दिन पहले बड़ी धूमधाम से महान वैचारिक व अध्यात्मिक संत स्वामी विवेकानंद जी की 157वीं जयंती मनाई गई . दुनियांभर में उनके अनुयायीयों व समस्त भारतवासीयों ने उनके महान विचारों को आत्मसात कर व उनके आदर्शों पर आगे बढ़ने की प्रतिज्ञा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी दोहराई होगी . मैं भी उस रस्म को निभाते हुए सर्वप्रथम स्वामी विवेकानंद जी को उनकी 157वीं जयंती पर याद कर उन्हें प्रणाम करता हूँ और उनके आदर्शों पर चलने का प्रण लेता हूँ .

आज का युवा .. अच्छी पढाई से कुर्सी पा सकते हैं, लेकिन उत्कृष्टता या लीडरशिप नहीं ! – शशि भूषण मैठाणी “पारस” एक दिन पहले बड़ी धूमधाम से महान वैचारिक व अध्यात्मिक संत स्वामी विवेकानंद जी की 157वीं जयंती मनाई गई . दुनियांभर में उनके अनुयायीयों व समस्त भारतवासीयों ने उनके महान विचारों को आत्मसात कर व उनके आदर्शों पर आगे बढ़ने की प्रतिज्ञा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी दोहराई होगी . मैं भी उस रस्म को निभाते हुए सर्वप्रथम स्वामी विवेकानंद जी को उनकी 157वीं जयंती पर याद कर उन्हें प्रणाम करता हूँ और उनके आदर्शों पर चलने का प्रण लेता हूँ . SHashi Bhushan Maithani Paras . Editor youth icon media . Youth icon national award . Youth day Swami Vivekanand ji । Dehradun । Uttarakhand
लेख  – ◆ शशि भूषण मैठाणी “पारस”  

अब सवाल यह है कि 157 वर्षों से हम हर वर्ष की 12 जनवरी के दिन यह प्रण लेने के बाद भी इतने वर्षों में अभी तक एक युवा विवेकानंद तैयार नहीं कर पाए . या नहीं पा सके ….!

आज युवा दिवस के उपलक्ष में, मैं अपनी बात लिख रहा हूँ, और युवाओं से सम्बन्धित ही बातें होनी भी चाहिए और मै आगे वही करूंगा भी . लेकिन उसके लिए मैं सबसे पहले आज के युवाओं को जागृत करना चाहूंगा . इसलिए मैं स्वामी विवेकानंद जी के वाक्यों के सहारे यही कहूंगा कि उठो, जागो, भागो, और भागो…. !

जी हाँ उठो, जागो, भागो, और भागो…. तब तक भागो कि जब तक लक्ष्य के करीब न पहुँच जाओ . रुकना फिर भी नहीं है क्योंकि लक्ष्य के समीप जाते ही उसका आकार भी वृहदाकार में बदल जाता है . जीवन में निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए राह में अनेकों बाधाएं आएंगी लेकिन जो उन बाधाओं से विचलित हुए बिना निरंतर बढ़ता है वही व्यक्ति सफल भी होता है . और वही सफर उसे परिपक्व़ा भी बनाता है . इसलिए जीवन में कभी रुकना नहीं है, थकना नहीं है . जीवन में संघर्षों की राह में आप अपनी जिजीविषा और जीवटता के साथ ही सफल हो सकेंगे .

जिजीविषा और जीवटता के साथ जीवन में वही व्यक्ति संघर्ष कर सकता है जिसके अन्दर आलस्य न हो . आलस्य हमारे शाररिक, मानसिक, सामाजिक, चारित्रिक व आर्थिक पतन का कारक है . अधिकाँश लोग अपना दुश्मन अपने आस-पड़ोस या अपने सगे सम्बन्धियों में भी खोज लेते हैं और फिर अधिकाँश वक्त उन्हीं को निबटाने या ठिकाने लगाने में ज़ाया कर देते हैं . लेकिन क्या कभी आप या हममें से किसीने अपने अन्दर छुपे दुश्मन को पहचानने की ईमानदारी से कोशिश की …! नहीं….. क्यों ..? क्योंकि मेरा अहं…मैं…और मेरी मर्जी…… जो कि हमें कभी हमारे अंदर झांकने ही नहीं देता है . हम जिस दिन सहृदयवादी बनकर अपने अन्दर के दुश्मन को पकड़ लेंगे तो उसी दिन से हमारी तरक्की की राह भी आसान हो जाएगी . इसलिए अपने अन्दर छुपे दुश्मन अहं .. मैं और मेरी मर्जी से ही उत्पन्न आलस्य को कसकर पकड़ लो, बाँध लो और सकारात्मकता के साथ उन्नति के मार्ग पर बढ़ चलो .

आज अवसर और चुनौतियाँ दोनों मुंह बाए खड़े हैं :

आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि परम्परागत कार्यशैली में तेजी से बदलाव आ रहा है . मसलन मैनुअल मशीनों की जगह अब डिजिटल मशीनों ने ले ली है . तकनिकी आधारित काम बढ़ गया . जिससे जॉब का स्वरूप बदल गया है और ऐसे में जो लोग नई टैक्नलोजी को अपनाने में अक्षम हैं तो उनके लिए आगे जमाने के साथ कदमताल करना आसान नहीं है . क्योंकि हमारा जीवन व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक सब नवीन डिजिटल तकनिकी आधारित हो रहा है . सुबह बिस्तर के अन्दर से ही देश और दुनियां की हर छोटी बड़ी ख़बरें हों या सुबह से लेकर रात तक पेट भरने का इंतजाम सब कुछ तकनिकी से सम्बद्ध हो गया है . आप अपने मोबाईल के मार्फत ख़बरें पढ़ लेते हैं . दोस्तों के अलावा पारिवारिक सदस्यों से सम्पर्क कर लेते हैं खाना ऑर्डर कर लेते हैं साथ ही साथ जिस संस्थान में आप काम कर रहें हैं वहाँ के काम भी आसानी से निबटा लेते हैं . तो ऐसे इसे कुछ लोगों के लिए चुनौती तो कुछ के लिए अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है .

दो दशक पहले तक सीमित अवसर ही थे जॉब के, अब हैं असीमित :

लगभग दो दशक पहले तक अच्छी व प्रतिष्ठित नौकरियों के नाम पर IAS, IPS, IFS, PCS, डाक्टर या इंजीयर आदि सीमित अवसर हुआ करते थे, जिन्हें हासिल करना सबके लिए आसान भी नहीं था . लेकिन आज इक्किशवीं सदी के बदलते दौर के साथ-साथ युवाओं को भी स्वयं को बदलना होगा . क्योंकि अब जॉब सीमित क्षेत्रों में सिमटी नहीं रह गई है . डिजिटल अवतार में इसका भी विस्तार हो चुका है. जॉब के ज्यादा ऑप्शन युवाओं को मिल गए हैं . लेकिन उन जॉब्स को हासिल करने के लिए आपको हर हाल में आज डिजिटल स्किल को अपनाना ही होगा . मसलन एक जमाने में किसी अस्पताल में डाक्टर, नर्स और वार्ड बॉय से काम चल जाता था लेकिन आज इनके अलावा ज्यादा जॉब क्रिएट हो गई हैं . कारण है तकनिकी आधारित चिकित्सा व शिक्षा . जाने माने न्यूरो सर्जन डॉ. महेश कुड़ियाल बताते हैं कि आज से 15 साल पहले तक 10 बिस्तरों वाले अस्पताल में 8 से 10 लोगों का ही काम था लेकिन बदलते डिजिटल दौर में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है अब एक बिस्तर पर 4 लोग जॉब कर रहे हैं . वो बताते हैं कि बिना OT टैक्नीशियन के ऑपरेशन नहीं हो सकता, बिना बायोमेडिकल इंजिनियर के आप मशीनों का रखरखाव नहीं कर सकते . यहाँ तक कि अब मरीज को चढ़ाया जाने वाला ग्लूकोज ड्रिप भी अब तकनिकी आधारित हो गया है पहले ड्रिप लगाकर छोड़ दिया जाता था फिर मरीज के साथ बैठा तीमारदार या बीच-बीच में नर्स देखने जाती और अंदाजे से कम ज्यादा किया जाता था लेकिन अब नई तकनिकी आ गई है . अगर डॉक्टर ने एक घंटे में मरीज को केवल 10 बूंद की आवश्यकता बताई है तो एक घंटे में 10 बूंद को ही फिक्स किया जाता है और मरीज के शरीर में उतना ही जाएगा . लेकिन यह सब पुराने लोग नहीं कर पाएंगे या तो उन्हें नई टैक्नोलोजी का फिर से 6-8 महीनो का प्रशिक्षण लेना होता है या फिर उनकी जगह नए लड़के – लड़कियों को जॉब दी जा रही है . डॉ. महेश कुडियाल बताते हैं कि आज मेडिकल क्षेत्र का सारा काम डिजिटल बेस हो गया है . यहाँ तक कि अस्पतालों में साफ़ सफाई भी मशीनों से होने लगी हैं जिन्हें चलाने के लिए ट्रेंड स्किल्ड ऑपरेटर की जरूरत होती है . OT, ICU या OPD तक में सब जगह मानिटर से काम लिया जाता और इन सबको चलाने के लिए टैक्नीशियन की आश्यकता होती है . इसलिए डिजीटल तकनिकी आधारित ज्ञान को अपनाना बेहद आवश्यक हो गया है . और इसमें जॉब की ज्यादा ओपोर्चिनिटी है .

जोमेटो, स्वीगी , ओला, उबर, अर्बन एप आदि जैसे कई स्टार्टप प्लेटफोर्म आज उपलब्ध हैं लेकिन यह सब भी डिजिटल आधारित ही हैं . इन सब क्षेत्रों में अच्छी जॉब पानी है या पार्टनरशिप मोड में जुड़ना है तो उसके लिए टैक्नोलोजी का ज्ञान होना आवश्यक है . आज आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंसी का जमाना आ गया है पहले आप हम टोल चुकाने के लिए लम्बी लम्बी लाईनों में घंटो खड़े रहते थे लेकिन अब गाड़ी आगे एक बारकोड वाला स्टीकर लग जाता है और टोल गेट पर लगा कैमरा अपने आप उसे स्केन कर आपके एकाउंट से पैसा ले लेता है इससे आपका समय बच जाता है . और आज देश में इस तरह के कोड डैवल्पर की बहुत ज्यादा डिमाण्ड है .

वकालत अब कोर्ट कचहरी तक सीमित नहीं है :

वर्तमान में GST एक बहुत अच्छा अवसर प्रदान करता है . लेकिन उसके लिए ज्ञान होना जरुरी है . वकालत का पेशा भी अब केवल कोर्ट कचहरी तक सीमित नहीं रहा है . आज कोर्पोरेट जगत में हर जगह लीगल सेल होता है . लीगल एडवोकेसी को आप आज एक स्टार्टटप के तौर पर भी ले सकते हैं . क़ानून मामलों के जानकार एक समूह बनाकर सरकारी गैर सरकारी क्षेत्रों में एडवाइजरी का काम कर अच्छाखासा मुनाफ़ा कमा रहे हैं . सरकार जीतनी भी स्कीमें निकालती हैं उनके ऑडिट भी होते हैं और वह सब लीगल फर्म के मार्फत ही किया जाता है . बैंक, अस्पताल, स्कूल हो या अन्य छोटे बड़े सरकारी गैरसरकारी संस्थाएं हर जगह डिजिटल तकनिकी का समावेश हो गया है . अगर जिसने तकनिकी को नहीं अपनाया तो उसे रेस से हटना ही पडेगा यह तय है .

ये कहावत रही है :

सबसे होशियार बच्चे ने IIT किया इंजिनियर बना , उससे कम वाले ने MBA किया वह इंजिनियर का बोस हुआ. फिर तीसरे नम्बर पर 45 से 50 प्रतिशत वाला बाबू बना और सबसे कम 33 प्रतिशत वाला इन सबका बोस बना यानी IAS , IPS इनकी अहर्ताएं 33% निर्धारित है . और जो पांचवीं, आठवीं या दशवीं पढ़े या न पढ़े इनसे भी बड़े हुए अर्थात नेता जी . और अंत में आती है उनकी बारी जिसने जीवन में एक शब्द भी शिक्षा का ग्रहण नहीं किया और उनके कदमों में लोटती है दुनियाँ वो कहलाए नीम, हकीम या बाबा जी . लेकिन अब ये भी डिजिटल की मार झेल रहे हैं और तभी तो आप देख पा रहे होंगे कि आजकल अचानक से फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले बाबा जी टीवी स्टूडियो में आए दिन की डिवेट दिखाई देने लगे हैं . और जटाधारी बाबा महात्माओं की जगह केश किंग या इन्दुलेखा से बालों को संरक्षित करने वाले महंगे महंगे इत्र सेंट से महकते बाबा लोग कई समारोहों में प्रकट हो रहे हैं .

 

पढ़ाई के साथ साथ अच्छी लीडरशिप भी जरुरी है :

बहुत से लोग पढ़ाई में अब्बल दर्जे के होते हैं वह हमेशा 90% से 99% के आंकड़े को छूते नजर आते हैं . जिसके एवज में उन्हें दुनियाँ में कहीं भी प्रतिष्ठित कुर्सियां भी मिल जाती हैं . परन्तु यह भी अक्सर देखा जाता है कि ऐसे कई लोगों में लीडरशिप की कमी पाई जाती है . हमेशा इस बात को समझ लीजिये कि लीडरशिप आपको किताबों को पढने से नहीं मिल सकती है . अच्छी लीडरशिप पाने के लिए आपको सबसे पहले व्यवहारिक होना जरुरी है. स्वाभाविक ही है कि जब-जब कोई व्यक्ति व्यवहारिक होगा तो उसका समाज में अच्छाखासा सम्पर्क भी स्थापित होगा, बेशक समाज में कुछ भले तो कुछ बुरे भी होंगे और उन्हीं के बीच रहने से व्यवहारिक व्यक्ति सही और गलत का आंकलन करने की क्षमता को विकसित करता है. उसे लोगों की राय को जुटाने की आदत बनती है, फिर वह किसी निष्कर्ष पर पहुँच कर अपनी राय रखता है तो वह सर्व स्वीकार्य हो जाती है . अच्छी पढ़ाई करके आप किसी जिले के कलेक्टर DM या डाक्टर बन सकते हो लेकिन अच्छा अधिकारी आपको सिर्फ और सिर्फ आपका सदव्यवहार ही बना सकता है . आपका जनसम्पर्क, आपकी सुनने व समझने की आदत ही आपको जीवन में उत्कृष्टता प्रदान कर सकती है . वरना सिर्फ पढ़ाई के बदौलत बने अधिकारी ड्राईबर, गनर के सहारे बंगले से ऑफिस और ऑफिस से बंगले तक ही आ जा सकता है और बाबू के सहारे सरकारी फाईलों पर साईन कर सकता है .

हमेशा गौर कीजिये कि DM से लेकर PM तक कोई भी हो अगर वह लॉजिक बेस डिसीजन और एक्शन लेते हैं तो उन्हें समाज हमेशा तबज्जो देता है . लोग उन्हें सुनते हैं और समझते हैं .

अक्सर हम देखते हैं कि जब कभी भी आप और हम कॉम्पिटेटिब एग्जाम देते हैं तो वहाँ मूल विषय से अलग इधर उधर की बाते पूछी जाती हैं और फिर हमारे मन में एक बार के लिए ख़याल आता है कि मैंने इंजिनियर, डाक्टर या मजिस्ट्रेट बनना है तो ऐसे इन प्रश्नों का क्या औचित्य है….. ! यही समझने और गौर करने वाली बात है यहाँ ये प्रश्न परीक्षार्थी की लीडरशिप को जानने के लिए दिए जाते हैं उसके लॉजिक को समझने के लिए दिए जाते हैं . उससे यह अपेक्षा रहती है कि यह व्यक्ति कल मुश्किल घडी में अपनी क्षमता से लीडरशिप में दक्ष बने और मुश्किल हालातों को बड़ी सूझ-बूझ व रचनात्मक तरीके से सम्पादित भी कर सके . इसलिए उसके ज्ञान का क्षेत्र सीमित न रहकर व्यापक रहे .

महज 39 साल की उम्र में स्वामी विवेकानंद जी ने वो सब कुछ किया जो हम पूरी उम्र नहीं कर सकते हैं .

21वीं सदी भारत की होगी ..!

भारत के पूर्व राष्ट्रपति मिसाईल मेन स्व. एपीजे अब्दुल कलाम साहब ने भी विभिन्न मंचों से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था कि 18 वीं या 19 वीं शताब्दी इंग्लैण्ड की थी , 20वीं शताब्दी अमेरिका तो अब अगर भारत का युवा चाहेगा तो 21वीं शताब्दी केवल और केवल भारत की होगी .

और मुझे भी पूरी उम्मीद है कि हमारे देश का युवा जातिवाद, क्षेत्रवाद और धार्मिक उन्माद जैसे विध्वंसक प्रपंचों से स्वयं ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण में अपनी बौद्धिक क्षमता व रचनात्मक सोच के बूते भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए योगदान सुनिश्चित करेगा .

जय हिन्द ! जय भारत !

शशि भूषण मैठाणी “पारस” 

SHashi Bhushan Maithani Paras 

9756839527 , 7060214681

By Editor

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!