Manoj Rawat MLA : उम्र 100 साल से ऊँपर ,15 साल की उम्र में विधवा, दो बार आवेदन किया पर विधवा पेंशन नही मिल पाई।

Chakravyuh : राजनीतिक चक्रव्यूह का शिकार उत्तराखंड का लोकतंत्र । 

समय बीता सालों बीते, चिताओं की मुखाग्नि में लाखों बैठे……

 

उत्तराखंड को देश का 27वां राज्य घोषित किया, मानो उसी वक्त इस राज्य के पहाडी इलाकों की तकदीर में अमावस की कालिमा अटखेलियाँ खेलने लग गईं । राज्य आंदोलनकारियों की माँगों के विपरीत सियासत ने उत्तराखंड के नाम पर एक ऐसा राज्य बनाया गया जो न कभी पूर्ण रूप से पर्वतीय था और न ही मैदानी । शायद यही वह मनहूस घडी होगी जिसका खामियाजा 17 साल बाद भी यह तथाकथित पहाड़ी राज्य, पलायन और पहाड बनाम मैदान के मल्युध की भांति भुगत रहा है। यदि उत्तराखंड के बीते 17 वर्षों के काले इतिहास को देखा जाए तो दो-तीन चीजें ऐसी दिखती हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं आया है वो हैं सरकारों के आने-जाने का क्रम , मुख्यमंत्रियों के निरंतर बदलने का क्रम और ….. आगे विस्तार से पढ़ें हिमांशु पुरोहित की खास रपट । 

हिमांशु पुरोहित YOUTH ICON Yi media award . Himanshu Purohit . News
हिमांशु पुरोहित 

उत्तराखंड का पहाडी क्षेत्र अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिये विश्व विख्यात है लेकिन जमीनी हकीकत की नजर से कोसों दूर, इक्कीसवीं सदी की चकाचौंध से हिमालय के गर्भ में स्तिथ यहाँ का ग्रामीण क्षेत्र विकास की सुविधा से वंछित है , इन पहाडियों में आज भी एकांतवास की तरह जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। हर रोज सूरज की पहली किरण, जिसकी शक्ति बर्फ से ढके हिमालय को एक चमकीली पर्वत माला के रूप में बदल देती है, जिसके इर्द-गिर्द बादलों का अनोखा जमावडा और मंत्रमुग्ध कर देने वाली पक्षियों की चहक, ऐसा नैसर्गिक दृश्य प्रस्तुत करती है जिसे देख दर्शक मानो पृथ्वी में ही स्वर्ग का आनंद ले लेता है। पर अफसोस ! सूरज की ये पहली किरण शायद इतनी शक्तिशाली नहीं कि वो इस सदूर क्षेत्र के पिछडे इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के जीवन के श्यामत्व का विभेदन कर सके। इस पर्वतीय आँचल का जन्म ही इस उद्देश्य से हुआ था कि यह एक पर्वतीय राज्य बने ताकि पहाड़ की आवश्यकताओं को अनिर्णीत कर उनका समाधान निकालने में सहूलियत हो सके। इक्कीसवीं सदी के विकास की दौड में कहीं कुमाँऊ-गढवाल पीछे न रह जाए, इसके लिय राज्य आंदोलनकारियों ने अपनी माँग में यह बात रखी की, कि उनकी माँग छोटे राज्य के लिए नहीं, अपितु पर्वतीय राज्य के लिए है ।

Chakravyuh : राजनीतिक चक्रव्यूह का शिकार उत्तराखंड का लोकतंत्र ।  समय बीता सालों बीते, चिताओं की मुखाग्नि में लाखों बैठे......

समय बीता सालों बीते, चिताओं की मुखाग्नि में लाखों बैठे……

जब, 9 नवम्बर, 2000 को उत्तर प्रदेश को खंडित कर, उत्तराखंड को देश का 27वां राज्य घोषित किया, मानो उसी वक्त इस राज्य के पहाडी इलाकों की तकदीर में अमावस की कालिमा अटखेलियाँ खेलने लग गईं । राज्य आंदोलनकारियों की माँगों के विपरीत सियासत ने उत्तराखंड के नाम पर एक ऐसा राज्य बनाया गया जो न कभी पूर्ण रूप से पर्वतीय था और न ही मैदानी । शायद यही वह मनहूस घडी होगी जिसका खामियाजा 17 साल बाद भी यह तथाकथित पहाड़ी राज्य, पलायन और पहाड बनाम मैदान के मल्युध की भांति भुगत रहा है। यदि उत्तराखंड के बीते 17 वर्षों के काले इतिहास को देखा जाए तो दो-तीन चीजें ऐसी दिखती हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं आया है वो हैं सरकारों के आने-जाने का क्रम , मुख्यमंत्रियों के निरंतर बदलने का क्रम और यहाँ तक की ‘हिमालयी सुनामी’ के नाम से प्रचलित 2013 की केदार त्रासदी का भी हमारे वजीरों पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा । राज्य में प्रशस्त राजनीतिक अस्थिरता, पहाडों से बढता पलायन, पहाड बनाम मैदान द्वंद्ध और गैरसैंण को राजधानी घोषित करने की माँग, कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनपर न तो कभी सही मायनो में विचार किया गया है न ही कोई कार्यवाही ।

Gairsain . गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग को लेकर पहाड़ में होने लगा है मंथन । लोग उतरने लगे हैं सड़कों पर । शुरुआत हो गई है रुद्रप्रयाग जनपद से । कहीं अब नब्बे के दशक से भी उग्र न हो जाय आंदोलन । सरकार हो जाओ खबरदार । youth icon yi media report । shashi bhushan maithani paras शशि भूषण मैठाणी पारस
गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग को लेकर पहाड़ में होने लगा है मंथन । लोग उतरने लगे हैं सड़कों पर । शुरुआत हो गई है , कहीं अब नब्बे के दशक से भी उग्र न हो जाय आंदोलन । सरकार हो जाओ खबरदार । 

आज उत्तराखंड की अधिकांश समस्याओं की बुनियाद कहीं न कहीं राज्य में विषम रूप से फैली व्यापक राजनीतिक अस्थिरता है। चाहे मुद्दा पहाडों से बढता पलायन, गैरसैंण का राजनीतिक अस्तित्व, राज्य में बेतहाशा, बेधड़क बन रही बिजली परियोजनाओं से हो रहे पुनर्रवास या फिर पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास का हो ?यदि हम राज्य में बीते 17 वर्षों से सामयिक तौर पर पनप रही राजनीतिक अस्थिरता का आंकलन कर लें तो राज्य की वर्तमान स्तिथि का दोषी हमसे बड़ा कोई नहीं या फिर राजनीति चक्रव्यूह की शिकार हो चुकी है जनता……? बरहाल इन प्रकरणों के मद्देनजर यह कहना नाजायज नहीं होगा कि…..

समय बीता सालों बीते, चिताओं की मुखाग्नि में लाखों बैठे……

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