घस्यारी प्रतियोगिता की विजेता महिलाएं ।

Ghasyari : उत्तराखण्ड की नारी – सिर पर चांदी का ताज आंखों में खुशी के आंसू….! 

RAKESH BIJALWAN, Yi

देवभूमि उत्तराखण्ड का नाम जब भी लिया जाता है यहां की नारी शक्ति की वीर गाथाएं बरबस ही सामने आ जाती हैं। उत्तराखण्ड में जितने भी आंदोलन हुए नारी शक्ति के बिना उनकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। आज हम अगर गर्व से कहते हैं कि हमारा उत्तराखण्ड हरित प्रदेश है तो इसके पीछे भी नारी शक्ति का एक लम्बा संघर्ष खड़ा है। पर्यावरण रक्षा  के लिए महिलाओं ने अपनी जान तक की परवाह नहीं की। चिपको आंदोलन का नाम पूरे विश्व में लिया जाता है, यह आंदोलन दर्शाता है कि पहाड़ की महिलाओं ने पेड़-पौधों को अपने परिवार का हिस्सा समझा और हमेशा इसकी रक्षा के

घस्यारी महोत्सव से संबन्धित रिपोर्ट यूथ आइकॉन समाचार पत्र में प्रकाशित ।  यूथ आइकॉन समाचार पत्र बाजार में उपलब्ध है । यदि आप नियमित तौर पर हमारे पाठक बन यूथ आइकॉन समाचार पत्र को अपने पते पर मंगवाना चाहते हैं हैं तो संपर्क करें :  9756838527  ,7060214681
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लिए आगे रही। देवभूमि के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ भी अगर किसी के आगे नतमस्तक होते हैं तो वो हैं यहां कि नारियां, और ऐसे में अगर उनको सम्मानित किया जाए तो उनकी भीगी हुई आंखों में खुशी की चमक साफ  दिखाई देगी। कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला टिहरी जिले के घनसाली तहसील के अखोड़ी गॉंव में, जब हुआ घास काटने वाली महिलाओं का चांदी का ताज पहनाकर सम्मान। 

 पहाड़ में घास काटने वाली महिलाओं को ‘घसियारी’ कहा जाता है और इस काम को बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता है जबकि ये महिलायें कमरतोड़ मेहनत करती हैं और पर्यावरण की सबसे बड़ी संरक्षक हैं। ये महिलाएं घास ही नहीं काटती घर चलाने के साथ पशुपालन और कृषि का काम भी करती हैं, ये महिलाएं जंगल संरक्षण में लगी ग्रामीण वन समितियों को अनाज के रूप में भुगतान भी करती हैं। इसलिए पर्यावरण सरक्षण में अमूल्य योगदान करने वाली ‘घसियारी’ का जब सम्मान हुआ तो सभी के दिल में एक ही बात थी कि आज उन्हें भी अहसास हुआ होगा कि  वह समाज के लिए कितना अहम काम कर रही हैं। टिहरी जिले के घनसाली तहसील के अखोड़ी गॉंव में हुई अपनी तरह की इस पहली अनूठी प्रतियोगिता में ग्रामीण महिलाओं ने हिस्सा लिया।  इन सभी महिलाओं को एक विशाल पहाड़ी ढलान में दो मिनट के अंदर अधिक से अधिक घास काटनी थी। घास काटने के बाद दूसरे रांउड में महिलाओं को पर्यावरणविदों के सवालों का भी सटीक जवाब देना था और ये सवाल जंगल और पर्यावरण से जुड़े हुए थे। बेस्ट  घसियारी का फैसला काटी गई घास के वजऩ और सवालों के सही जवाब के आधार पर मिले अंकों से किया गया।  सभी जानते हेँ कि घसियारी ही जंगल को बचाती है। और जंगल से पानी, खेती और पशु जुड़े है। पहाड़ के लोगों की आजीविका जंगल पर निर्भर होने के कारण जंगल को बचाना हम सभी की  परम्पर में रहा है।  वन विभाग ने लोगो को जंगलों से दूर कर दिया है। इस लिए आज जगलो में आग लगती है तो कोई बुझाने नहीं आता। त्रेपन सिंह चौहान कहते हैं कि श्रम का सम्मान नए भारत के लिए नया उत्तराखंड नारे के साथ इस कार्यक्रम को किया जाता है। आगे लोगों को प्रड्यूशर कंपनी बना कर तमाम परियोजनाओं को लोगो को देने का काम करेंगे।

घसियारी महोत्सव : पर्यावरण रक्षा के लिए अनूठी पहल 

 विमला, ज्ञानसू, इंद्रा बनी ‘बेस्ट घसियारी’ 
घस्यारी प्रतियोगिता की विजेता महिलाएं ।
घस्यारी प्रतियोगिता की विजेता महिलाएं ।

टिहरी जनपद में बेस्ट घसियारी प्रतियोगिता ग्राम स्तर पर 25 नवम्बर से शुरू हो गई थी। इस प्रतियोगिता में गांव सतर पर बिजेता तीन घसियारियों को न्याय पंचायत लेबल पर पहुँचना होता है, उसके बाद 8 दिसंबर से 18 दिसंबर तक न्याय पंचायत स्तर पर चुनी गई घसियारियों के बीच प्रतियोगिता होती है। न्याय पंचायत स्तर से विजेता तीन घसयारियों का चयन फाइनल के लिए होता है। भिंलगना विकास खंड के 186 ग्राम पंचायतो में कुल 11 न्याय पंचायत है। इन न्याय पंचायतो के कुल 33 प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया। जिनके बीच हुए कड़े मुकाबले में जीतकर आई तीन बेस्ट घसियारियां। बिजेता घसियारियों में 171.14 अंक हासिल करने के साथ प्रथम स्थान पर रही चिलियाल गांव की विमला देवी। इनको डॉ शेखर पाठक ने 160 ग्राम चांदी का मुकुट और राजीव लोचन शाह ने एक लाख का चेक दे कर सम्मानित किया। 165.7 अंको के साथ दूसरे स्थान पर रही धनसानी बासर की ज्ञानसू देवी को कमला पंत, गंगा असरोड, और बल्ली सिंह चीमा ने मुकुट के साथ 51000 हजार रूपये का चेक देकर सम्मानित किया। 160.04 अंको के साथ तीसरे स्थान पर रही अखोडी गांव की इंद्रा देवी को कल्याण सिंह रावत, श्री नंदनंदन पांडे और विजय थपलियाल ने 100 ग्राम चांदी का मुकुट और 21000 रुपये का चेक देकर सम्मानित किया। सिर पर चांदी का ताज और हाथ में चेक पाकर घसियारियों के आंखों में खुशी के आंसू थे। सभी ने एक सुर में कहा कि उन्हें जो सम्मान मिला है इसकी परिकल्पना उन्होंने कभी नहीं की थी। जिस घास काटने के काम को वह हर रोज़ अपने जानवरों को चारा खिलाने और परिवार के पोषण के लिए यूं ही करती हैं वह उन्हें  बेस्ट इकोलोजिस्ट अवॉर्ड  से सम्मानित करवाएगा। सभी के दिल में ईनाम की रकम से बच्चों को ऊंची शिक्षा देने की उमंग और दिल में खुसी कि हम हैें बेस्ट घसियारी। 

त्रेपन की सोच को सलाम
सामाजिक कार्यकर्ता त्रेपन सिंह चौहान
सामाजिक कार्यकर्ता त्रेपन सिंह चौहान

घसियारियों को सम्मान की सोच और उन्हें एक नई पहचान दिलाने का काम किया है 45 साल के लेखक, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता त्रेपन सिंह चौहान नेे। चौहान पिछले दो साल से घसयारी प्रतियोगिता आयोजित कर रहे हैं, अभी ये प्रयोग टिहरी तक सीमित है, लेकिन उनकी कोशिश इसे पूरे उत्तराखंड में फैलाने की है। चौहान किसी एनजीओ से नहीं जुड़े बल्कि उन्होंने लोगों के सहयोग से इस प्रतियोगिता के लिए धनराशि इक्_ा की है, उनका चेतना आंदोलन पहाड़ों में महिलाओं को जागृत कर एक और  चिपको आंदोलन  खड़ा करना चाहता है। चौहान के साथ इस प्रयोग को सफ ल बनाने में लगे शंकर गोपाल कृष्णन। इस सालाना प्रतियोगिता से चौहान और उनके साथी महिलाओं को जंगलों से जोडऩा चाहते हैं। वन विभाग ग्रामीणों और इन महिलाओं के प्रति नफ रत भरा रवैया अपनाता है और सरकार भी इन्हें इनके वह अधिकार नहीं दे रही जिसके ये हकदार हैं। जैसे 2006 बनाए गए वन अधिकार कानून के तहत अब तक सरकार ने फ ॉरेस्ट ज़ोन नोटिफाइ नहीं किये हैं और इन लोगों को इनके ही जंगलों से दूर रखा जा रहा है।

By Editor