Alok nautiyal , आलोक नौटियाल ।जादुई ध्वनियां का स्वतंत्र सौंदर्य पूरी घाटी में अनूठी छटा बिखेर रहा था, जो कि अमूर्तन में भी आत्मीय लग रहा था , उस कलाकार से मिलने की उत्सुकता में रास्ता बड़ी आसानी से गुजर गया । पैदल मार्ग की थकान मिटाने व कुछ देर ठहर कर इस कलाकार से बात करने का बड़ा मन था , इसलिए जब इनके हाल-चाल जाने तब इनके हंसते खिलखिलाते चेहरे व उपेक्षा की पीड़ाओं का द्वंद साफ छलक पड़ा... तब लगा हम सामाजिक आर्थिक बदलावों के इस दौर में अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को कैसे बिसरते जा रहे हैं ,

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इस आवाज में क्या है ऐसा जादू , कि 3 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई का भी नहीं चला पता ।

 

जादुई ध्वनियां का स्वतंत्र सौंदर्य पूरी घाटी में अनूठी छटा बिखेर रहा था, जो कि अमूर्तन में भी आत्मीय लग रहा था , उस कलाकार से मिलने की उत्सुकता में रास्ता बड़ी आसानी से गुजर गया । पैदल मार्ग की थकान मिटाने व कुछ देर ठहर कर इस कलाकार से बात करने का बड़ा मन था , इसलिए जब इनके हाल-चाल जाने तब इनके हंसते खिलखिलाते चेहरे व उपेक्षा की पीड़ाओं का द्वंद साफ छलक पड़ा… तब लगा हम सामाजिक आर्थिक बदलावों के इस दौर में अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को कैसे बिसरते जा रहे हैं ,

Alok nautiyal
◆ लेख : आलोक नौटियाल (शिक्षक) ,

ये हैं श्रीमान सुरेंद्र राम जी । नाम मे थोड़ा कन्फ्यूजिया गया हूँ …..! इनसे हमारी मुलाकात पिछले महीने कार्तिक स्वामी जाते वक्त हुई थी । कार्तिक स्वामी सड़क मार्ग से करीब 3 किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित है । घाटियों में बजते हुए ढोल का संगीत मेरी इस यात्रा के मुख्य आकर्षण का केंद्र रहा । जिन जादुई ध्वनियां का स्वतंत्र सौंदर्य पूरी घाटी में अनूठी छटा बिखेर रहा था, जो कि अमूर्तन में भी आत्मीय लग रहा था , उस कलाकार से मिलने की उत्सुकता में रास्ता बड़ी आसानी से गुजर गया । पैदल मार्ग की थकान मिटाने व कुछ देर ठहर कर इस कलाकार से बात करने का बड़ा मन था , इसलिए जब इनके हाल-चाल जाने तब इनके हंसते खिलखिलाते चेहरे व उपेक्षा की पीड़ाओं का द्वंद साफ छलक पड़ा… तब लगा हम सामाजिक आर्थिक बदलावों के इस दौर में अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को कैसे बिसरते जा रहे हैं , देखने सुनने की सामग्रियों की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता ने इन कलाओं और कलाकारों को हाशिये पे धकेल दिया है , क्योंकि इन जैसे प्रतिभावान कलाकार , कितना भी अपना जीवनानुभव झोंक दें फिर भी वे ठेठ मनोरंजन के स्तर पर इनसे होड़ नहीं कर पाएंगे और न ही समझौता ।

Alok nautiyal , आलोक नौटियाल ।जादुई ध्वनियां का स्वतंत्र सौंदर्य पूरी घाटी में अनूठी छटा बिखेर रहा था, जो कि अमूर्तन में भी आत्मीय लग रहा था , उस कलाकार से मिलने की उत्सुकता में रास्ता बड़ी आसानी से गुजर गया । पैदल मार्ग की थकान मिटाने व कुछ देर ठहर कर इस कलाकार से बात करने का बड़ा मन था , इसलिए जब इनके हाल-चाल जाने तब इनके हंसते खिलखिलाते चेहरे व उपेक्षा की पीड़ाओं का द्वंद साफ छलक पड़ा... तब लगा हम सामाजिक आर्थिक बदलावों के इस दौर में अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को कैसे बिसरते जा रहे हैं ,
जादुई ध्वनियां का स्वतंत्र सौंदर्य पूरी घाटी में अनूठी छटा बिखेरता है , जो कि अमूर्तन में भी आत्मीय लगता है  । 

चुर्की फुरकी टाइप संगीत के स्तर तक जाने तक इनकी खुद की मौलिकता भी समाप्त हो जाएगी । इसलिए कुछ कलाएं ऐसी हैं जो संरक्षण के बिना जीवित नहीं रह सकती , गर इन्हें हम व्यवसायिक होड़ में धकेल देंगे तो इनका नष्ट होना तय है । हम आप भी इनके संरक्षण में सहायक भूमिका निभा सकते हैं , हमें अपनी संस्कृति की इन ध्वनियों को सुनना समझना होगा , बाकी इनके संरक्षण में प्रमुख भूमिका तो उन्हीं संस्थानों व संसधानों की होनी चाहिए जो कर्म के स्तर पर सक्षम व ईमानदार हों । वैसे शासन-प्रशासन के आगे हमारी सलाहें तो नक्कारखाने में तूती की आवाज से ज्यादा कुछ नहीं ।

◆ आलोक नौटियाल

By Editor