The Migration man of Uttarakhand Ratan Singh Aswal . रतन सिंह असवाल : पलायन एक चिंतन

 

The Migration man of Uttarakhand  Ratan Singh Aswal .

पर्वतीय जनपदों से पलायन का न्यूनीकरण का वास्ता प्रतिबद्ध रतन सिंह असवाल

 

उत्तराखण्ड आंदोलन का आवाज उठाण वळा जों लोगों थे पुलिस का डण्डा पुड़िन रतन सिंह असवाल भी ऊं मान एक छिन । पैलि दां वर्ष १९९४ मा हल्द्वानी म विरोध प्रदर्शन करणा क दौरान रतन सिंह असवाल थे पुलिस घार बिटिन उठै कन लीगे छै पिठैं-पाणी भी लगि, पर बाद मा कुछ खास लोगों क हस्तक्षेप का बाद हवालात मा रैणा कि नौबत नि ऐ । बर्ष १९९४ मा हि दुसरि दां हल्द्वानी का तिकोनिया मा कर्फ्यू तोड़ना की कोशिश करना का दौरान फ़िर एक बार पी०ए०सी० का जवानों द्वारा रतन सिंह की आन-द-स्पाट आवभगत ह्वे, पर इबरि दां जरा बड़ु डोज़ मिलणा का कारणा द्वि दिन अस्पताल अर वेका बाद एक हफ़्ता का बेड-रेस्ट की जरुरत पोड़ि ।

 

विनय के डी vinay k d
विनय के डी 

रतन सिंह असवाल कु जलम २२ मई १९६७ कु पौड़ी गढ़वाल का कलजीखाल ब्लाक असवालस्यूं पट्टी ग्राम मिरचौड़ा म ह्वे छै । ददा ठाकुर स्व० श्री गोपी सिंह असवाल इलाका का प्रभावशाली स्थापित थोकदार अर पिता श्री अब्द्याल सिंह पूरा इलाका का नामी बैद्य छाया । पांच भाई अर तीन बैंणियूं म रतन सिंह पिता श्री अब्द्याल सिंह अर माता श्रीमती शाकंभरी देवी क चौथी संतान छाइ । रतन सिंह की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्राम मिर्चौड़ा म अर वैका बाद उच्च शिक्षा हल्द्वानी बिटि ह्वे ।

रोजगार की तलाश मा १ अगस्त १९९० खुण रतन सिंह असवाल यूरेका फ़ोर्ब्स कंपनी का सेल्स टीम मा जूड़िन अर वेका बाद वर्ष १९९४ बिटि बर्ष २००१ तक पेप्सी कंपनी म सेल्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्शन मा काम करि ।

 

The Migration man of Uttarakhand Ratan Singh Aswal . रतन सिंह असवाल : पलायन एक चिंतन
समाजसेवी  रतन सिंह असवाल को  गुजरात में यूथ आइकॉन नेशनल अवार्ड 2018 से सम्मानित किया जाएगा । 

नौकरी का दगड़ि दगड़ि रतन सिंह असवाल सामाजिक क्षेत्र से जुड़यां रैनि अर साथ ही उत्तराखण्ड आंदोलन मा अपणि सक्रिय भागीदारी भी दर्ज करि । उत्तराखण्ड आंदोलन का आवाज उठाण वळा जों लोगों थे पुलिस का डण्डा पुड़िन रतन सिंह असवाल भी ऊं मान एक छिन । पैलि दां वर्ष १९९४ मा हल्द्वानी म विरोध प्रदर्शन करणा क दौरान रतन सिंह असवाल थे पुलिस घार बिटिन उठै कन लीगे छै पिठैं-पाणी भी लगि, पर बाद मा कुछ खास लोगों क हस्तक्षेप का बाद हवालात मा रैणा कि नौबत नि ऐ । बर्ष १९९४ मा हि दुसरि दां हल्द्वानी का तिकोनिया मा कर्फ्यू तोड़ना की कोशिश करना का दौरान फ़िर एक बार पी०ए०सी० का जवानों द्वारा रतन सिंह की आन-द-स्पाट आवभगत ह्वे, पर इबरि दां जरा बड़ु डोज़ मिलणा का कारणा द्वि दिन अस्पताल अर वेका बाद एक हफ़्ता का बेड-रेस्ट की जरुरत पोड़ि ।

घुमक्कड़ी रतन सिंह असवाल कु बचपन से पसंदीदा शौक रै । पेप्सी क सेल्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूशन मा नौकरी का दौरान तत्कालीन उत्तर-प्रदेश का पर्वतीय जनपदों का जनमानस और गावों की स्थिति से रतन सिंह अच्छी तरह से परिचित छै । प्रदेश बणना का बाद बर्ष २००१ तक पेप्सी कंपनी थें अपणि सेवा दीणा का बाद रतन सिंह असवाल नौकरी छोड़ि कि समाजिक सरोकारों से जुड़ना का वास्ता उत्तराखण्ड प्रदेश का गौं-गौं शहर-शहर घुमणा खातिर एडवेंचर टूरिज्म कु व्यवसाय शुरु करि । रतन सिंह का पिताजी ठाकुर अब्दयाल सिंह क्षेत्र का जण्यां-मन्यां बैद्य होणा का साथ-साथ एक राजनैतिक-सामाजिक व्यक्ति भि छाया, त परिवार का राजनितिक माहौल होणा का कारण रतन सिंह का राजनैतिक झुकाव भी स्वाभविक छै । रतन सिंह अपणा घुमक्कड़ी, व्यवसाय अर समाज सेवा का इतर कांग्रेसी विचारधारा का होणा का कारण एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता की भागीदारी भी अदा करना छाया, मंशा या भि छै कि बर्ष २००२ मा अपणी बिधानसभा सीट से चुनाव लड़ै जालु, पर २००२ मा कांग्रेस पार्टी से टिकट नि मिल साक । लिहाजा जनता अर कुछ खास भै-बंदो की सलाह पर निर्दलीय लड़ना की तैयारी शुरु करे ग्ये । पर दुसरि तरफ़ां सीट पर भाजपा प्रत्याशी श्री तीरथ सिंह रावत का दावेदारी भरणा का बाद पिता ठाकुर अब्दयाल सिंह जी का ये निर्देश पर कि “तीरथ सिंह रावत जी भि अपणा ही इलाका का उम्मीदवार छन, त ज्यादा बेहतर च कि तटस्थ रै कि अपणा सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों की पूर्ति करे जाव” रतन सिंह असवाल जी न निर्दलीय चुनौ लड़ना कु विचार छोड़ द्या ।

२००२ का बिधानसभा चुनौ मा जनमत कांग्रेस का पक्ष मा ह्वे अर प्रदेश मा कांग्रेस की सरकार अस्तित्व मा अये । रतन सिंह कांग्रेस संगठन का युवा कार्यकार्ता की भूमिका म काम करना छाया, वूंकि लगन अर निष्ठा देखि कि तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष श्री हरीश रावत जी न असवाल जी का समणा प्रदेश का युवा समन्वयक की भूमिका संभालना क प्रस्ताव रखे पर असवाल जी न यु बोलि की प्रस्ताव स्वीकार करना मा असमर्थता जाहिर करि कि “मि पार्टी मा कोई पद ल्येकि संगठन का दगड़ी बंधणा नि चाणू छों, पर एक युवा पहाड़ी नागरिक और राजनीतिक कार्यकर्ता का रूप मा हमेशा पार्टी का दगड़ि खड़ू छों…” । ये दौरान रतन सिंह पार्टी का नेताओं और मंत्रियों का समणि समाज की समस्याओं थें रखणा रैनि अर मुख्य रूप से एक उद्देश्य छै कि सरकार का द्वारा गैरसैण राजधानी मुद्दा का हल निकले जाव…

समय का साथ-साथ जनमत बदलणू रै, कांग्रेस अर भाजपा हरकि फ़रकि कि सरकार बाणाणा रैनि पर पहाड़ अर पहाड़ी लोग द्विया का द्वि सिर्फ़ घोषणापत्रों तक सीमित रैनी पर बहस का मुद्दा नि बण साका । गैरसैंण राजधानी मुद्दा भी राज्य गठन का डेढ़ दशक बाद भी गैर ही बण्यू रै, कैं भी पार्टी न ये मुद्दा पर सकारात्मक पहल नि करि । जून २०१४ मा जनता का दबाव अर कांग्रेस सरकार की रड़दी छवि देखणा का बाद तत्कालीन माननीय बिधानसभा अध्यक्ष श्री गोबिंद सिंह कुण्जवाल का निर्देश पर रतन सिंह असवाल टैंट मा पहलु बिधानसभा सत्र गैरसैण मा कराणा मा सफ़ल ह्वेनि । सरकार कु आश्वासन अर जनता की उम्मीद छै कि गैरसैण मा पहला बिधानसभा सत्र का बाद शायद पर्वतीय प्रदेश की पर्वतीय राजधानी वळा विचार पर क्वी सकारात्मक निर्णय आलो पर हमेशा कि तरह अबरि दां भी उत्तराखण्ड का पहाड़ी जनमानस का भाग मा सिर्फ़ आश्वासन ही ऐनी अर गैरसैण फ़िर गैर ही रै….

पहाड़ का ज्वलंत मुद्दों पर द्विया सरकारों कु ढीलम-ढिलू रवैया देखि कि रतन सिंह कु मन खिन्न ह्वे ग्ये अर अपणा हृदय मा पहाड़ का वास्ता दर्द, एक उलार, कुछ सुपिन्या ल्येकि संयोजक रतन सिंह असवाल का नेतृत्व मा बर्ष 2015 मा पलायन एक चिंतन दल का उदय ह्वाई । यु भी एक बिचित्र सी घटना छै कि सोशल मीडिया का एक छुट्टु सी अपडेट से ये दल कु गठन ह्वाई अर कुछ अनौपचारिक वार्ताओं का बाद पलायन से सबसे ज्यादा प्रभावित जनपद पौड़ी का सभागार मा पहली औपचारिक विचारगोष्ठी अक्टूबर २०१५ का अंतिम सप्ताह मा आयोजित कर्‌ये ग्ये। जैमा उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि पूरे देश का महानगरों मा बस्यां कई प्रवासी भै-बंधों न भाग ल्याई। ये का बाद उत्तरकाशी जनपद, नौगांव विकासखण्ड मा तिलाड़ी कांड का जननायक श्री दयाराम रंवाल्टा का ग्राम कंसेरू मा दुसरी विचार गोष्ठी नवंबर माह का तीसरा सप्ताह मा आयोजित कर्‌ये ग्ये। यह रवांई उत्तराखण्ड कु ऊ क्षेत्र च जख की पलायन दर बहुत कम च। यख आज भी गौं-गुठ्यार आबाद छन, खेत लहलहाणा छन अर बण पशु-पक्षियों का आवाज से गुंजायमान रैंदन। येका बाद जनवरी माह का तीसरा सप्ताह मा कौथीग फ़ाऊंण्डेशन मुंबई द्वारा “पलायन एक चिंतन” दल थें कि मुंबई मा हर सल आयोजित होण वळा कार्यक्रम “कौथीग” मा विचार गोष्ठी करना कु निमंत्रण दिये ग्याई, उद्देशय छै प्रवासी भै-बंधुओं का साथ एक संवाद स्थापित करनु अर उत्तराखण्ड मा रिवर्स माईग्रेशन का दगड़ि दगड़ि पहाड़ का विकास मा प्रवासी लोगों की भूमिका अर संभावनाओं पर चर्चा। ये तीन सफ़ल आयोजनों का बाद अप्रैल माह का अंतिम सप्ताह मा दल का सदस्यों द्वारा उत्तराखण्ड का उत्तरकाशी जनपद का पुरोला विकासखण्ड की सर-बडियार घाटी का भ्रमण कर्‌ये ग्या। पैली बार ३५ किमी का दायरा मा बसीं सर-बडियार की पैदल दुर्गम घाटी का स्थानीय निवासियों का दैनिक जीवन का दु:ख-दर्द इलेक्ट्रानिक, प्रिंट और सोशल मीडिया का जरिया जनमानस तक पौंचि, जैंथे देखिकन जुलाई मैना का दुसरा सप्ताह मा उत्तराखण्ड का नव-निर्वाचित राज्य सभा सांसद प्रदीप टम्टा न पलायन एक चिंतन दल का दगड़ि बडियार घाटी का गावों कु पैदल दौरा करना कु प्रस्ताव रखि। बेशक यु पलायन एक चिंतन दल खुणे कि एक उपलब्धि ही छै कि आजादी का ७० साल मा पहली बार कोई सांसद अर पूरा सरकारी अमला उस क्षेत्र के पैदल दौरे पर वख पौंचि। ऊं लोगों न वख तीन दिन तक स्थानीय लोगों का बीच रह कन वूंकी समस्याओं, वूंका दर्द थे सुणि अर समझि, अर आश्वासन द्याइ कि जल्द से जल्द आभाव अर अंधेरां में रैणा वळा ये क्षेत्र मा खुशियों की नई सुबेर रौशनी ल्येकि आली, अर येका वास्ता प्रयास जारी छन।

१६ जून २०१३ की आपदा न उत्तराखण्ड का जनजीवन अर आर्थिकी तें सबसे ज्यादा प्रभावित करि। पलायन एक चिंतन दल का सदस्यों न आपदा की तिसरी बरसी पर जून २०१६ मा केदार घाटी अर पिण्डर घाटी का दौरा करि, उद्देश्य छै यु विश्लेषण करन कि यूं तीन सालों मा प्रशासन का साथ साथ हम लोगों न क्या ख्वै, क्या पाई और क्या सीख ल्याई। कुल मिलैकि हालात आज भी बहुत कष्टकारी छन, आपदा का पुनर्निर्माण अर यात्रा थें सुचारू करना कि श्रेय लेणा की होड़ मा जों लोगों थें जल प्रलय से सबसे ज्यादा नुकसान पौंचि, प्रशासन ऊंथे ही भूल ग्या। वू लोग आज भी विकट परिस्थितियों का बीच जीवन यापन करणा कु मजबूर छ्न। दल का भ्रमण का दौरान आपदा से पैलि का कई इन तथ्य निकळि कन समणि अयेनि जो अचंभित करणा वळा छन अर वूंका कभी कखि क्वी जिक्र नहीं ह्वेई, निथर ह्वे सकद छै कि गुमशुदा और मरणा वळा लोगों का आंकड़ा कुछ कम होंदु। इतगा ही नहीं मुआवजा अर सुविधाओं की बंदरबांट अर लूट-खसोट का बीच आपदा प्रभावित अर वूंका जीवन हाशिये पर चल ग्याई अर कोई पुछण वळु नी च।

येका बाद पलायन एक चिंतन विचार गोष्ठी, “पहाड़ : संस्कृति, साहित्य और लोग” कु आयोजन दिनांक 14 व 15 अगस्त 2016, कनासर चकराता मा ह्वे मुख्य उद्देशय यु छै कि ये जौनसार क्षेत्र की थाती-माटी से जुड़यां लोकपर्वों, लोकसंस्कृति, संयुक्त परिवार प्रणाली पर गहनता से विचार करिकि अपणा खेत-खलिहान गॉव परिवार का मूल्यों थे समझ सकन। गोष्ठी से द्वि प्रस्ताव, पहला कि उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी गैरसैण बणै जाव तथा दुसरा उत्तराखण्ड मा 250 वर्ग मीटर की कृषि भूमि पर उत्तराखण्ड से बाहर का लोगों दवारा खरीद-फ़रोख्त पर रोक लगाई जाव सर्व सम्मति से पारित कर्‌ये गेनि। अर माननीय राज्यसभा सांसद का जरिया सदन पटल फ़र भी रख्ये ग्येनि अर राज्य सरकार का दगड़ भी चर्चा करे ग्ये ।

जब प्रदेश मा विधानसभा सीटों कु परिसीमन ह्वे छै तब तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नारायण दत्त तिवारी अर सरकार का मंत्रियों का समणि रतन असवाल अर अन्य युवा कार्यकर्ताओं न मिलिकि ये परिसीमन कु बिरोध करि अर पूर्वोत्तर राज्यो की तरज फ़र पैरवी करना की पहल करि किन्तु सत्त्ता का नाशा मा चूर एक भी मंत्री का दगड़ि तत्कालीन मुख्यमंत्री न असवाल अर अन्य कार्यकर्ताओं कि बात फ़र क्वी ध्यान नि द्या । नतीजा आज सब्युं का समणि चा । अर यदि 2026 का परिसीमन मा भी यही स्थिति राली त नि:संदेह ये पर्वतीय प्रदेश का गठन की अवधारणा पर लग्यूं प्रश्न चिन्ह दुनिया का इतिहास में दर्ज ह्वे जालू । निसंदेह ये दल की उपलब्धि कु अंदाजा ये बात से लग्ये जै सकदु कि वर्ष २०१७ का विधानसभा चुनावों मा “पलायन” की समस्या थे द्विया मुख्य पार्टियों कु घोषणापत्र मा पैली बार स्थान मिल साक । पक्ष – विपक्ष का साथ साथ जनता भी ये मुद्दा पर पैली बार मुखर ह्वे अर, सरकार का प्रयासों का मा पलायन आयोग कु गठन परिणाम का रूप मा साकार ह्वे साक । यु बेशक एक म्हत्वपूर्ण अर सराहनीय कदम च कि रतन सिंह असवाल अर वूंका दल का सदस्यों न मिलिकि पलायन का ज्वलन्त मुद्दा थें सब्युं का समणि लाणा कू प्रयास करि, खासकर तब जबकि सरकार या मीडिया वूंकि भूमिकाओं थे सही ढंग से नी बींग पाणा छन । अलग-अलग स्थानों पर बिचार गोष्ठी, पद यात्राओं का द्वारा यु दल रतन सिंह असवाल का नेतृत्व मा दल का सदस्यों द्वारा अपणा संसाधन से ये मुहिम थे चलांदा यु लोग सराहनाओं से ल्येकि आलोचनाओं का एक लम्बा दौर देखिकन एनि, लेकिन फ़िर भी यु लोग डट्यां छन, यु सोचिकन कि उत्तराखण्ड और पहाड़ की बात करण वळी यू शायद आखरी पीढ़ी च। वक्त रैंदा समास्याओं पर चिंतन अर समाधान की बात नहीं ह्वाई त नयी छ्वाळि का बच्चों थे भविष्य मा येका दुष्परिणाम दिखण प्वाड़ला।

लेख : विनय के डी Vinay K D 

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