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क्या वर्ण व्यवस्था के लिए आज का ब्राह्मण जिम्मेदार है?

Yogesh Dhasmana , Srinagar
Yogesh Dhasmana , Srinagar

समाज को सुसंगठित रूप से चलाने के लिए नियम कानून की आवश्यकता होती है। सृष्टि के निर्माण से लेकर आज तक हमारा समाज नियम कानून की विभिन्न व्यवस्थाओं से होकर गुजरा है। इन व्यवस्थाओं में निरंतर विकास के लिए बदलाव हुए हैं। हर नयी व्यवस्था अपने से पूर्व की व्यवस्था से ज्यादा बेहतर एवं यथार्थ रही है। हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था भी समाज को सुचारु रुप से चलाने के लिए स्थापित हुई थी। वर्ण व्यवस्था में समाज को चार वर्गों में बाँटा गया था। हर वर्ग को एक विशेष जिम्मेदारी दी गई थी। ब्राह्मण को आध्यात्म एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार, क्षत्रिय को धर्म की रक्षा एवं शुद्र को श्रमिक का कार्य सौंपा गया। शुरुआत में यह वर्ण व्यवस्था सिर्फ कर्म पर आधारित थी परंतु धीरे-धीरे यह व्यवस्था जाति आधारित हो गयी। वर्ण व्यवस्था का कर्म से बदलकर जाति आधारित होने का मुख्य कारण भी कर्म पर ही आधारित था  क्योंकि जो कर्म जिस वर्ग को बाँटा गया था वह कर्म उन्हीं लोगों की नयी पीढ़ी आसानी से सीख लेती थी। जैसे कि वैध का बेटा वैध ही बनने लगा क्योंकि वह अपने पूर्वजों से यह ज्ञान लेना बचपन से ही शुरू कर देता था। हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था में यह बडा  बदलाव था। समाज में कर्म की प्रधानता खत्म होकर जाति की प्रधानता हो जाने से हिन्दू समाज में भेदभाव की शुरुआत हो गयी थी। यह एक बुरा बदलाव था लेकिन इसने हिन्दू धर्म में अच्छे बदलावों की नींव डाल दी थी। और इसी कारण आज हिन्दू धर्म में और बेहतर बदलावों की माँग उठती है।
हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी खासियत इसका लचीलापन है। इसी लचीलेपन के कारण हिन्दू धर्म ने सबसे अधिक बदलावों को स्वीकार किया है। बाल विवाह, सती प्रथा आदि अनेक कलंकित प्रथाओं को छोड़कर हिन्दू धर्म आगे बढा है जबकि कई अन्य धर्मों में आज भी दृढ़पन है। अर्थात यह कहना तर्कसंगत होगा की सर्वाधिक विकास हिन्दू धर्म का ही हुआ है।
परंतु क्या प्राचीन वर्ण व्यवस्था के कारण उत्पन्न हुए भेदभाव के लिए आज का ब्राह्मण जिम्मेदार है? यह प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि आज जहाँ दलित समाज अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है वहीं कुछ लोग इस लड़ाई में आज के ब्राह्मणों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर उन्हें कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका यह कदम ब्राह्मणों एवं दलितों के बीच एक नयी खाई खोदना मात्र है। इन बेतुकी बातों के बीच एक कटु सत्य दब जाता है। सत्य यह है की आज भी ग्रामीण भारत के दलित भेदभाव के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा नहीं बन पायें हैं। इसका सबसे बडा कारण उनकी गरीबी एवं भुखमरी है। ग्रामीण भारत के दलितों की आजीविका आज भी ब्राह्मण परिवारों पर निर्भर करती है। एक घटना याद आती है जो कुछ ही समय पूर्व घटित हुई। मैं अपने करीबी रिश्तेदार की शादी में गया था। उनका हाल निवास अब शहर में है इसलिए बैण्ड वालों को ही बुलाया गया था। परंतु इसके बावजूद बिना आमंत्रण के उनके गाँव से दलित परिवार के कुछ लोग ढोल-दमाऊँ के साथ उनके हाल निवास पर पहुँच गये। जब उनसे आने का कारण पूछा तो उनमें से एक दलित व्यक्ति का जवाब यह था -“हम आपके दास हैं, आप अपने दासों को आमंत्रण देना कैसे भूल सकते हैं, आपके हर शुभ अशुभ कार्य में सम्मिलित होने का हमारा हक बनता है, अाप हमारे ठाकुर हो।”
इससे यह अहसास होता है कि समाज में भेदभाव के लिए उतनी जिम्मेदार मनुस्मृती नहीं है जितना की दलितों की आर्थिक स्थिति। ‘मनुस्मृती’ भी कोई पुस्तक है मुझे स्वयं इस बात का ज्ञान 20 वर्ष की उम्र में एक राजनीतिक कार्यक्रम में हुआ। जब मैंने यही बात अपने गाँव के बुजुर्गों से पूछी तो उन्हें भी मनुस्मृती की कोई खबर नहीं थी। अब प्रश्न यह भी उठता है कि फिर क्यों मनुस्मृती को जलाकर आज के ब्राह्मण समाज को कोसा जाता है? अंततः यही निष्कर्ष निकलता है कि ना ही अाज के ब्राह्मणों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करने से और ना ही मनुस्मृती को जलाने से भेदभाव खत्म होगा। मनुस्मृती ने समाज नही बनाया है, समाज ने मनुस्मृती बनायी थी। यह ज्यादा तर्कसंगत संगत होगा की ग्रामीण भारत के दलितों की आर्थिक स्थिति सुधारी जाए वरना तबतक ग्रामीण भारत के दलित भेदभाव के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते जबतक कि उनकी आजीविका ब्राह्मण परिवारों से जुड़ी रहेगी।

*योगेश धस्माना

यह युवा लेखक के अपने स्वतंत्र विचार हैं । 

By Editor

9 thoughts on “क्या वर्ण व्यवस्था के लिए आज का ब्राह्मण जिम्मेदार है?”
  1. Meri smaj se iss artical ka ekmatr udeshya hindu samaj se jaati aadharit bhedbhaav ko sampt krna hai ….or mera manna yeh h ki iss bhedbhaav k liye koi jaati visesh jimedaar nhi h ..balki keval kuch choti mansikta wale log jimedaar hain…mai lekhak ki bhavnaao ka samman krte hue ye sujhav dena chahti hu ki ydi iss bhedbhaav ko khatm krna h to aise logo ko smjana hoga jinke vicharro maj unch- nich ki bhavana bhri ho …na ki kisi jaati visesh ko jimedaar tharana shi hoga…

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