दाँतों की सेहत, आधुनिक तकनीक और बदलती जीवनशैली: जानिए दंत चिकित्सक डॉ. सचिन रस्तोगी से!

देहरादून के पानी से लेकर फुल माउथ डेंटल इम्प्लांट तक, दाँतों की देखभाल पर एक विस्तृत बातचीत!
देहरादून अब केवल पहाड़ों का प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि तेजी से बदलती जीवनशैली, खानपान और आधुनिक शहरी सुविधाओं वाला शहर बन चुका है। यहाँ एक ओर प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ी खानपान और बदलता मौसम है, तो दूसरी ओर चाय-कॉफी, फास्ट फूड, मीठे पेय, तम्बाकू और अनियमित दिनचर्या का बढ़ता चलन भी है। बदलती जीवनशैली का असर हमारी संपूर्ण सेहत के साथ-साथ दाँतों और मसूड़ों पर भी दिखाई देता है। बच्चों में कम उम्र में कैविटी, युवाओं में दाँतों का टेढ़ापन, वयस्कों में मसूड़ों की बीमारी और बुजुर्गों में दाँतों का गिरना आम समस्याएँ बनती जा रही हैं।
लेकिन आधुनिक दंत चिकित्सा ने इन समस्याओं के उपचार की तस्वीर बदल दी है। आज डिजिटल एक्स-रे, CBCT, इंट्राओरल स्कैनर, लेजर डेंटिस्ट्री, डेंटल इम्प्लांट और क्लियर अलाइनर जैसी तकनीकों से उपचार पहले की तुलना में अधिक सटीक और सुविधाजनक हो गया है। इन्हीं विषयों पर चर्चा करने के लिए आज हमने देहरादून के अनुभवी दंतरोग विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. सचिन रस्तोगी, जो मरीजों को आधुनिक दंत चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध करा रहे हैं, से विस्तार से बातचीत की।
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पेश हैं इस विशेष साक्षात्कार के महत्वपूर्ण अंश।
शशि पारस: डॉ. साहब, देहरादून के पानी में चूना अधिक होने की बात अक्सर कही जाती है। क्या किसी क्षेत्र का मौसम और पानी का दाँतों पर वास्तव में कोई प्रभाव पड़ता है?
डॉ. सचिन: शशि जी, यह एक महत्वपूर्ण विषय है। देहरादून और उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता अलग-अलग हो सकती है। कुछ क्षेत्रों में पानी की hardness और mineral content अधिक हो सकता है।
लेकिन एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि कैल्शियम युक्त पानी को सीधे टार्टर या पायरिया का कारण नहीं माना जा सकता। टार्टर मुख्यतः दाँतों पर जमा बैक्टीरियल प्लाक के mineralisation से बनता है। जब प्लाक की नियमित सफाई नहीं होती, तो वह कठोर होकर कैलकुलस या टार्टर का रूप ले लेता है। इसके तीन प्रमुख प्रभाव हैं –
1. Dental Calculus: दाँतों पर पीला या भूरा कठोर जमाव।
2. Gingivitis: मसूड़ों में सूजन, लालिमा और ब्रश करते समय खून आना।
3. Periodontitis: बीमारी बढ़ने पर दाँतों को सहारा देने वाली हड्डी और ऊतकों का नुकसान।
जहाँ तक पानी का सवाल है, उसकी गुणवत्ता की जाँच आवश्यक है। केवल TDS देखकर पानी को सुरक्षित या असुरक्षित नहीं कहा जा सकता। फ्लोराइड की अधिक मात्रा से Dental Fluorosis हो सकता है। इसलिए लोगों को अपने क्षेत्र के पानी की गुणवत्ता के अनुसार उचित filtration system का इस्तेमाल करना चाहिए।
शशि पारस: उत्तराखंड के पारम्परिक भोजन मंडुए की रोटी, झंगोरा, भट्ट, सिद्धू, गुड़ और पहाड़ी खानपान को हम स्वास्थ्यवर्धक मानते हैं। क्या ये दाँतों के लिए भी अच्छे हैं?
डॉ. सचिन: निश्चित रूप से, संतुलित पारंपरिक खानपान के कई फायदे हैं। मंडुआ, झंगोरा, दालें, हरी सब्जियाँ और फाइबर युक्त भोजन सामान्य स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं। लेकिन दाँतों की सेहत केवल भोजन के नाम पर नहीं, बल्कि उसमें मौजूद शुगर, उसकी चिपचिपाहट और सेवन की आवृत्ति पर भी निर्भर करती है। उदाहरण के लिए जैसे बार-बार मीठी चाय पीना। चाय के साथ बिस्कुट और रस्क खाना। टॉफी, चॉकलेट और कैंडी। कोल्ड ड्रिंक्स और पैकेज्ड जूस। चिपचिपी मिठाइयाँ और गुड़ का बार-बार सेवन।
ये सभी दाँतों में कैविटी का खतरा बढ़ा सकते हैं। मेरी सलाह है कि मीठा खाने के बाद बार-बार ब्रश करने की जरूरत नहीं, लेकिन सादे पानी से कुल्ला करें और मीठे का सेवन बार-बार करने से बचें।
शशि पारस: आमतौर पर लोग कहते हैं कि दाँत में कीड़ा लग गया है। क्या वास्तव में दाँत में कोई कीड़ा होता है?
डॉ. सचिन: नहीं, दाँत में कोई कीड़ा नहीं होता। इसे Dental Caries यानी दंत क्षय कहते हैं।
हमारे मुँह में अनेक प्रकार के बैक्टीरिया रहते हैं। जब हम बार-बार चीनी या मीठे खाद्य पदार्थ खाते हैं, तो मुँह के बैक्टीरिया इन शर्कराओं को तोड़कर एसिड बनाते हैं। यह एसिड धीरे-धीरे दाँतों के एनामेल से मिनरल्स निकालता है। इसे Demineralisation कहते हैं। शुरुआत में सफेद धब्बे दिखाई दे सकते हैं। यदि समय पर ध्यान न दिया जाए तो दाँत में गड्ढा बन जाता है।
इसलिए दाँत में दर्द शुरू होने का इंतजार नहीं करना चाहिए। शुरुआती कैविटी का उपचार अपेक्षाकृत आसान होता है।
शशि पारस: बाजार में इतने प्रकार के टूथपेस्ट और ब्रश उपलब्ध हैं कि लोग भ्रमित हो जाते हैं। सही चुनाव कैसे करें?
डॉ. सचिन: यह बहुत जरूरी सवाल है। मेरी सलाह है कि ब्रश: हमेशा Soft या Ultra-soft bristles वाला ब्रश चुनें। बहुत जोर लगाकर ब्रश न करें। हर 3–4 महीने में या ब्रिसल्स खराब होने पर ब्रश बदलें।
इसी तरह टूथपेस्ट का भी चयन करें जैसे- वयस्कों के लिए 1350–1500 ppm Fluoride वाला टूथपेस्ट सामान्यतः उपयुक्त है।सेंसिटिविटी के लिए Potassium Nitrate या अन्य प्रमाणित desensitising ingredients वाला पेस्ट उपयोगी हो सकता है। बहुत ज्यादा abrasive whitening toothpaste का अनावश्यक इस्तेमाल न करें।
ब्रश करने का सही तरीका अपनाएं, दिन में दो बार, कम से कम दो मिनट ब्रश करें। रात का ब्रश सबसे महत्वपूर्ण है। Modified Bass Technique में ब्रश को दाँत और मसूड़े के जंक्शन पर लगभग 45 डिग्री पर रखकर हल्के छोटे-छोटे स्ट्रोक दिए जाते हैं। ब्रश करने के बाद पेस्ट थूक दें, लेकिन तुरंत पानी से जोरदार कुल्ला न करें। इससे फ्लोराइड का प्रभाव बना रहता है। इसके अतिरिक्त रोजाना Floss या Interdental Brush से दाँतों के बीच सफाई भी जरूरी है।
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शशि पारस: आजकल इलेक्ट्रिक टूथब्रश का चलन बढ़ रहा है। क्या सामान्य ब्रश की जगह इसे अपनाना चाहिए?
डॉ. सचिन: इलेक्ट्रिक टूथब्रश एक अच्छा विकल्प है। इसमें कई मॉडल में टाइमर और प्रेशर सेंसर होते हैं, जिससे ब्रश करने की तकनीक बेहतर हो सकती है।
विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों, हाथों में आर्थराइटिस वाले लोगों और जिनकी ब्रशिंग तकनीक सही नहीं है, उनके लिए यह उपयोगी हो सकता है।
हालाँकि, सही तकनीक से इस्तेमाल किया गया सामान्य सॉफ्ट ब्रश भी प्रभावी है। इलेक्ट्रिक ब्रश अनिवार्य नहीं है।
शशि पारस: कई लोग कहते हैं कि ब्रश करते समय मसूड़ों से खून आता है। वे इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। क्या यह सही है?
डॉ. सचिन: बिल्कुल नहीं। स्वस्थ मसूड़ों से सामान्य ब्रशिंग के दौरान खून नहीं आना चाहिए।
मसूड़ों से खून आने के प्रमुख कारण हैं जैसे –
1. Dental Plaque का जमाव।
2. Gingivitis यानी मसूड़ों की सूजन।
3. Periodontitis यानी मसूड़ों और हड्डी की गंभीर बीमारी।
4. गलत ब्रशिंग तकनीक या अत्यधिक दबाव।
5. कुछ मामलों में अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ।
यदि मसूड़ों से लगातार खून आ रहा है, तो डेंटिस्ट से जाँच करवानी चाहिए।
पायरिया केवल दाँतों की सफाई की समस्या नहीं है। यह दाँतों को सहारा देने वाले ऊतकों और हड्डी को प्रभावित कर सकता है।
शशि पारस: पायरिया का नाम तो लगभग हर व्यक्ति ने सुना है। यह कितना गंभीर है?
डॉ. सचिन: पायरिया को चिकित्सकीय भाषा में Periodontitis कहते हैं। यह एक chronic inflammatory disease है, जिसमें बैक्टीरियल प्लाक और शरीर की inflammatory response के कारण दाँतों के आसपास के मसूड़े और हड्डी प्रभावित होते हैं।
इसके मुख्य लक्षण जैसे, मसूड़ों से खून आना। मुँह से दुर्गंध। मसूड़ों का पीछे हटना। दाँत लंबे दिखाई देना। दाँतों में गैप बढ़ना। दाँतों का हिलना।
समय पर इलाज न होने पर दाँत गिर भी सकते हैं। उपचार में Professional Scaling, Root Planing और जरूरत के अनुसार Periodontal Surgery शामिल हो सकती है।
शशि पारस: बहुत से लोग शिकायत करते हैं कि ठंडा पानी, आइसक्रीम या गर्म चाय पीने पर दाँतों में झनझनाहट होती है।
डॉ. सचिन: इसे Dental Hypersensitivity कहते हैं। इसके मुख्य कारण हैं, मसूड़ों का पीछे हटना। एनामेल का घिसना। गलत तरीके से ब्रश करना। दाँतों में कैविटी। दाँतों में दरार। दाँत पीसने की आदत। सेंसिटिविटी के लिए विशेष टूथपेस्ट उपयोगी हो सकता है, लेकिन लगातार दर्द या किसी एक दाँत में तेज झनझनाहट होने पर जाँच आवश्यक है। कई बार जिसे मरीज सेंसिटिविटी समझता है, वह वास्तव में दाँत की नस में सूजन भी हो सकती है।
शशि पारस: लोगों को लगता है कि दाँत में तेज दर्द हुआ तो अब RCT ही करवाना पड़ेगा। क्या यह सही है?
डॉ. सचिन: नहीं। हर दर्द में RCT की जरूरत नहीं होती। दाँत के दर्द के कई कारण हो सकते हैं, शुरुआती कैविटी। गहरी कैविटी। Pulpitis। दाँत में फ्रैक्चर। मसूड़ों की बीमारी। Wisdom Tooth Infection। आदि… यदि कैविटी शुरुआती अवस्था में है, तो केवल फिलिंग से काम चल सकता है। यदि संक्रमण दाँत की नस यानी Pulp तक पहुँच गया है और नस में irreversible damage हो गया है, तो RCT की जरूरत पड़ सकती है।
शशि पारस: Root Canal Treatment को लेकर लोगों में बहुत डर है। क्या आज भी इसमें दर्द होता है?
डॉ. सचिन: RCT यानी Root Canal Treatment एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें संक्रमित या irreversibly damaged pulp को हटाकर दाँत के अंदर की नहरों को साफ और disinfect किया जाता है। इसके बाद नहरों को Gutta-percha जैसे biocompatible material से भरा जाता है। आजकल आधुनिक उपकरणों, Rotary Endodontics, Apex Locator और प्रभावी Local Anaesthesia की मदद से यह प्रक्रिया काफी आरामदायक हो गई है।
उपयुक्त मामलों में RCT एक ही बैठक में किया जा सकता है। लेकिन हर केस में ऐसा संभव नहीं होता। RCT के बाद दाँत की स्थिति के अनुसार Crown लगाना भी जरूरी हो सकता है, ताकि दाँत की मजबूती और कार्यक्षमता बनी रहे।
शशि पारस: आजकल मरीज चाहते हैं कि बार-बार क्लिनिक न आना पड़े। क्या एक ही दिन में पूरा उपचार संभव है?
डॉ. सचिन: कुछ चयनित मामलों में Single Visit RCT के बाद उसी दिन definitive restoration किया जा सकता है। इसी तरह आधुनिक CAD/CAM तकनीक की मदद से कुछ परिस्थितियों में उसी दिन क्राउन भी बनाया जा सकता है। लेकिन संक्रमण, दाँत की स्थिति, नहरों की जटिलता और अंतिम restoration की आवश्यकताओं के अनुसार उपचार का समय तय किया जाता है। मेरा मानना है कि उपचार जल्दी करना अच्छी बात है, लेकिन उपचार की गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए।
शशि पारस: देहरादून में भी आधुनिक तकनीक उपलब्ध है। आम मरीज को इन तकनीकों का क्या लाभ मिलता है?
डॉ. सचिन: आधुनिक दंत चिकित्सा में पिछले कुछ वर्षों में बहुत बड़ा बदलाव आया है। कुछ प्रमुख तकनीकें हैं मैठाणी जी अगर आप इन्हें अपने इंटरव्यू में क्रम से दर्शाएंगे तो आपके पाठकों को ज्यादा अच्छे से समझ आएगा जैसे …
1- Digital OPG: पूरे जबड़े और दाँतों की panoramic imaging।
2- CBCT: जबड़े, हड्डी, नसों और अन्य anatomical structures की 3D imaging। विशेषकर implant planning में उपयोगी।
3- Intraoral Scanner: मुँह के अंदर डिजिटल स्कैन लेकर क्राउन, ब्रिज और अन्य restorations तैयार करना।
4- Laser Dentistry: चयनित मसूड़ों और soft tissue procedures में उपयोगी।
5- Rotary Endodontics: RCT को अधिक व्यवस्थित और कुशल बनाने वाली तकनीक।
6- CAD/CAM Dentistry: कंप्यूटर आधारित डिजाइन और क्राउन निर्माण।
7- Digital Implant Planning: इम्प्लांट की स्थिति और दिशा की बेहतर योजना बनाने में मदद। इनका सबसे बड़ा फायदा है बेहतर diagnosis, सटीक planning और मरीज के लिए अधिक सुविधाजनक उपचार।
शशि पारस: यदि किसी व्यक्ति का दाँत निकल जाता है, तो उसके पास क्या विकल्प होते हैं?
डॉ. सचिन: मुख्यतः तीन विकल्प हैं। पहला, Removable Denture इसे मरीज जरूरत के अनुसार निकाल और लगा सकता है। यह अपेक्षाकृत किफायती विकल्प है।
दूसरा, Fixed Dental Bridge
इसमें खाली स्थान के दोनों ओर के दाँतों को सहारा बनाकर ब्रिज लगाया जाता है। इसके लिए कई मामलों में आसपास के दाँतों को तैयार करना पड़ता है। तीसरा, Dental Implant
यह आधुनिक और प्रभावी विकल्प है। इसमें टाइटेनियम या उपयुक्त अन्य implant material का fixture जबड़े की हड्डी में लगाया जाता है। इसके ऊपर abutment और crown लगाया जाता है।
इम्प्लांट के माध्यम से खोए हुए दाँत को बिना पड़ोसी दाँतों को घिसे प्रतिस्थापित किया जा सकता है। हालाँकि, हर मरीज के लिए इम्प्लांट उपयुक्त नहीं होता। हड्डी, मसूड़ों और सामान्य स्वास्थ्य का मूल्यांकन जरूरी है।
शशि पारस: कई लोग पूछते हैं कि इम्प्लांट लगवाने के बाद क्या दोबारा दाँत लगवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी?
डॉ. सचिन: Dental Implant एक दीर्घकालिक उपचार विकल्प है। लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि हर इम्प्लांट जीवनभर बिना किसी समस्या के चलता रहेगा। इसकी सफलता निर्भर करती है, सही मरीज का चयन। पर्याप्त हड्डी और उचित implant positioning। Surgical technique। Smoking से दूरी। Diabetes और periodontal health का नियंत्रण। नियमित maintenance।
इम्प्लांट के आसपास भी मसूड़ों की बीमारी हो सकती है, जिसे Peri-implantitis कहते हैं। इसलिए इम्प्लांट लगवाने के बाद भी ब्रशिंग, interdental cleaning और नियमित डेंटल चेकअप जरूरी है।
शशि पारस: आजकल All-on-4 और All-on-6 की काफी चर्चा है। ये तकनीकें क्या हैं?
डॉ. सचिन: यह आधुनिक Full Mouth Implant Rehabilitation की महत्वपूर्ण तकनीकें हैं। जिन मरीजों के पूरे जबड़े में दाँत नहीं हैं या अधिकांश दाँत निकालने की स्थिति में हैं, उनके लिए All-on-4 या All-on-6 एक विकल्प हो सकता है। All-on-4 में चार और All-on-6 में छह इम्प्लांट की मदद से पूरे जबड़े का fixed prosthesis तैयार किया जाता है। कुछ चयनित मरीजों में इम्प्लांट लगाने के दिन या 24–72 घंटे के भीतर provisional fixed teeth दिए जा सकते हैं। इसे Immediate Loading कहते हैं। लेकिन यह हर मरीज में संभव नहीं है। इसके लिए जरूरी है:
CBCT आधारित 3D planning। पर्याप्त implant primary stability। उचित bone volume। नियंत्रित bite forces और occlusion। अच्छी oral hygiene। मरीज का उपचार और maintenance के प्रति सहयोग।
उक्त तकनीक मरीज को स्थिर दाँतों के साथ खाने, बोलने और मुस्कुराने में मदद कर सकती है।
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शशि पारस: भारत में डायबिटीज के मरीजों की संख्या बहुत अधिक है। क्या वे इम्प्लांट लगवा सकते हैं?
डॉ. सचिन: हाँ, नियंत्रित डायबिटीज वाले कई मरीज सफलतापूर्वक इम्प्लांट लगवा सकते हैं।
लेकिन uncontrolled diabetes में infection और delayed healing का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए इम्प्लांट से पहले, Blood sugar और HbA1c का मूल्यांकन। मसूड़ों की बीमारी का उपचार। दवाओं और सामान्य स्वास्थ्य का मूल्यांकन। पर्याप्त oral hygiene। जरूरी है। डायबिटीज होना अपने आप में इम्प्लांट के लिए पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। मरीज का व्यक्तिगत मूल्यांकन सबसे महत्वपूर्ण है।
शशि पारस: क्या 65–70 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए भी इम्प्लांट संभव हैं?
डॉ. सचिन: बिल्कुल। इम्प्लांट के लिए केवल उम्र को आधार नहीं बनाया जाता। यदि व्यक्ति का सामान्य स्वास्थ्य अच्छा है, हड्डी पर्याप्त है और वह उपचार के बाद उचित देखभाल कर सकता है, तो अधिक उम्र में भी इम्प्लांट संभव हैं। आज 60, 70 और 80 वर्ष के मरीजों में भी आधुनिक implant rehabilitation किया जा रहा है। महत्वपूर्ण है मरीज का स्वास्थ्य, दवाओं का इतिहास, bone condition और oral hygiene।
शशि पारस: कई लोगों के दाँत पहले ठीक थे, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनके बीच गैप आने लगता है। इसका क्या कारण है?
डॉ. सचिन: दाँतों के बीच की जगह को Diastema या Spacing कहा जाता है। इसके प्रमुख कारण हैं, Periodontitis यानी मसूड़ों और हड्डी की बीमारी। दाँतों के आकार और जबड़े के आकार में असंतुलन। High frenal attachment। Tongue thrusting जैसी आदतें। दाँतों की अनुपस्थिति के कारण पड़ोसी दाँतों का खिसकना। कुछ मामलों में orthodontic relapse।
वयस्कों में अचानक गैप बनना या पहले से मौजूद गैप का बढ़ना विशेष रूप से जाँच योग्य है, क्योंकि यह periodontal bone loss और pathological tooth migration का संकेत हो सकता है। इलाज कारण के अनुसार किया जाता है। छोटे गैप में Composite Bonding, कुछ मामलों में Veneers और बड़े गैप में Braces या Clear Aligners उपयोगी हो सकते हैं।
शशि पारस: क्या बचपन से टेढ़े-मेढ़े दाँत या बाहर निकले हुए दाँत 30–40 साल बाद भी ठीक किए जा सकते हैं?
डॉ. सचिन: बिल्कुल। Orthodontic Treatment के लिए कोई ऐसी निश्चित उम्र सीमा नहीं है जिसके बाद उपचार संभव न हो।
आज 30, 40 और 50 वर्ष की उम्र में भी लोग Braces और Clear Aligners से दाँत ठीक करवा रहे हैं। जिनके प्रमुख विकल्प हैं:
Metal Braces। Ceramic Braces।
Self-ligating Braces। Clear Aligners।
Clear Aligners पारदर्शी होते हैं और मरीज उन्हें खाने तथा ब्रश करने के समय निकाल सकता है। हालाँकि, हर प्रकार की malocclusion का उपचार अलाइनर से समान रूप से नहीं किया जा सकता। मसूड़ों और हड्डी की स्थिति अच्छी होनी चाहिए। Periodontal disease हो तो पहले उसका उपचार जरूरी है।
शशि पारस: कई लोगों के आगे के दाँत बाहर निकले और लंबे होते हैं। क्या उन्हें घिसकर छोटा करना सही है?
डॉ. सचिन: सीधे ज्यादा घिसकर दाँत छोटा करना सही तरीका नहीं है। दाँत की बाहरी परत Enamel होती है। इसे अधिक घिसने से अंदर का Dentine उजागर हो सकता है और Sensitivity या अन्य समस्याएँ हो सकती हैं। यदि दाँत बाहर निकले हुए हैं, तो Orthodontic Treatment से उनकी position सुधारी जा सकती है। यदि दाँत वास्तव में लंबे दिख रहे हैं, तो पहले यह पता करना जरूरी है कि कारण दाँत का आकार है, मसूड़ों की स्थिति है या हड्डी और जबड़े की बनावट। कुछ मामलों में Gingival Contouring, Veneers या अन्य Cosmetic Procedures उपयोगी हो सकते हैं।
शशि पारस: आजकल लोग फिल्मों और सोशल मीडिया में सफेद चमकते दाँत देखकर Whitening करवाना चाहते हैं। क्या यह सुरक्षित है?
डॉ. सचिन: Dental Whitening यानी Bleaching एक सामान्य cosmetic procedure है।
लेकिन सबसे पहले दाँतों और मसूड़ों की जाँच जरूरी है। Whitening के विकल्प हैं, Professional In-office Whitening। Dentist-supervised Home Whitening। कुछ मामलों में Internal Bleaching।
ध्यान देने वाली बात यह है कि Whitening से सभी प्रकार के stains नहीं हटते। क्राउन, ब्रिज और Veneers का रंग bleaching से नहीं बदलता। बाजार में मिलने वाले अनियंत्रित whitening products और घरेलू नुस्खों से बचना चाहिए। अधिक या गलत इस्तेमाल से sensitivity और gum irritation हो सकती है।
शशि पारस: कई लोग इस समस्या से परेशान रहते हैं, लेकिन किसी से चर्चा नहीं कर पाते। इसका कारण क्या है?
डॉ. सचिन: इसे Halitosis कहते हैं। इसके प्रमुख कारण हैं, जीभ पर बैक्टीरिया और debris का जमाव। मसूड़ों की बीमारी। दाँतों में कैविटी। मुँह का सूखना। Smoking और Tobacco। कुछ ENT और systemic conditions।
.उपचार के लिए केवल mouth freshener या माउथवॉश पर्याप्त नहीं है। जीभ की सफाई, दाँतों के बीच सफाई और मूल कारण का उपचार आवश्यक है।
शशि पारस: माता-पिता अक्सर कहते हैं कि दूध के दाँत तो बदलने ही हैं, इसलिए उनमें कैविटी होने पर इलाज क्यों करवाएँ?
डॉ. सचिन: यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है।
दूध के दाँत बच्चों के चबाने, बोलने, चेहरे के विकास और स्थायी दाँतों के लिए जगह बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि दूध का दाँत समय से पहले खराब होकर निकालना पड़े, तो स्थायी दाँतों की alignment प्रभावित हो सकती है। बच्चों के लिए मेरी सलाह है:
* पहला डेंटल चेकअप पहला दाँत आने के बाद या अधिकतम एक वर्ष की उम्र तक करवाएँ।
* दिन में दो बार उम्र के अनुसार fluoride toothpaste से ब्रश करवाएँ।
* रात को दूध की बोतल मुँह में लगाकर न सुलाएँ।
* बार-बार मीठा खाने से बचाएँ।
* जरूरत पड़ने पर Pit and Fissure Sealants लगवाएँ।
बच्चों के दूध के दाँतों की देखभाल भी उतनी ही जरूरी है जितनी स्थायी दाँतों की।
शशि पारस: गर्भवती महिलाएँ अक्सर डेंटिस्ट के पास जाने से डरती हैं। क्या गर्भावस्था में दाँतों का इलाज करवाया जा सकता है?
डॉ. सचिन: यह भी एक महत्वपूर्ण विषय है।
गर्भावस्था के दौरान hormonal changes के कारण मसूड़ों में सूजन और Gingivitis की संभावना बढ़ सकती है। गर्भवती महिलाओं को नियमित ब्रशिंग, फ्लॉसिंग और डेंटल चेकअप जारी रखना चाहिए। जरूरी Dental Treatment, जैसे फिलिंग, RCT और आवश्यकतानुसार एक्स-रे, उचित सुरक्षा और चिकित्सकीय परामर्श के साथ किया जा सकता है। विशेषकर दर्द, संक्रमण या सूजन होने पर इलाज टालना नहीं चाहिए।
शशि पारस: क्या दाँतों और मसूड़ों की बीमारी का असर शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ता है?
डॉ. सचिन: निश्चित रूप से Oral Health और General Health एक-दूसरे से जुड़े हैं।Periodontitis और Diabetes के बीच द्विदिश संबंध पाया गया है। डायबिटीज में मसूड़ों की बीमारी का जोखिम बढ़ सकता है और गंभीर periodontal inflammation से blood glucose control प्रभावित हो सकता है।
Periodontal disease और cardiovascular disease के बीच भी संबंध देखा गया है, हालांकि इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि मसूड़ों का इलाज सीधे हृदय रोग को रोक देता है। इसलिए मुँह की सेहत को संपूर्ण स्वास्थ्य का हिस्सा मानना चाहिए।
शशि पारस: कई लोगों की अक्ल दाढ़ टेढ़ी निकलती है और दर्द करती है। क्या हर अक्ल दाढ़ निकालना जरूरी है?
डॉ. सचिन: नहीं, हर Wisdom Tooth निकालना जरूरी नहीं होता। यदि अक्ल दाढ़ सही स्थिति में है, पूरी तरह निकली हुई है, साफ रखी जा सकती है और उसमें कोई बीमारी नहीं है, तो उसे रखा जा सकता है। लेकिन यदि वह फँसी हुई है, बार-बार संक्रमण करती है, पड़ोसी दाँत को नुकसान पहुँचा रही है या उसमें कैविटी है, तो Extraction की जरूरत हो सकती है।
इसका निर्णय Clinical Examination और जरूरत के अनुसार X-ray या CBCT से किया जाता है।
शशि पारस: उत्तराखंड में भी तम्बाकू और गुटखे का सेवन काफी देखने को मिलता है। ये कितने खतरनाक हैं?
डॉ. सचिन: यह हमारे समाज की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। तम्बाकू, गुटखा, सुपारी और धूम्रपान मुँह के कैंसर तथा अन्य गंभीर बीमारियों के प्रमुख जोखिम कारक हैं। इनसे कई समस्याएँ होती हैं जैसे..
1. दाँतों पर काले-भूरे stains।
2. मसूड़ों की बीमारी।
3. Oral Submucous Fibrosis (OSMF)।
4. Leukoplakia और अन्य potentially malignant disorders।
5. Oral Cancer का बढ़ा हुआ जोखिम।
OSMF में मुँह के अंदर के ऊतक सख्त होने लगते हैं और धीरे-धीरे मुँह खोलने में परेशानी हो सकती है। शराब और तम्बाकू का संयुक्त सेवन कैंसर का जोखिम और बढ़ाता है।
शशि पारस: आम आदमी कैसे पहचान सकता है कि मुँह में कोई गंभीर बीमारी विकसित हो रही है?
डॉ. सचिन: कुछ लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए
* मुँह में सफेद या लाल धब्बा।
* ऐसा छाला जो दो सप्ताह में ठीक न हो।
* जीभ या गाल के अंदर गांठ।
* मुँह खोलने में परेशानी।
* निगलने में कठिनाई।
* बिना स्पष्ट कारण खून आना।
* आवाज में बदलाव या गर्दन में गांठ।
ऐसे लक्षणों में Oral Medicine Specialist या संबंधित विशेषज्ञ से तुरंत जाँच करवानी चाहिए। डेंटल क्लिनिक में नियमित Oral Examination बहुत महत्वपूर्ण है। VELscope जैसी विशेष लाइट तकनीक कुछ संदिग्ध ऊतकों के मूल्यांकन में सहायक हो सकती है, लेकिन यह कैंसर की पुष्टि नहीं करती। आवश्यकता होने पर Biopsy और Histopathological Examination से निदान की पुष्टि की जाती है। मुँह के कैंसर में शुरुआती पहचान और समय पर उपचार जीवन बचा सकता है।
शशि पारस: बच्चों के खेलने या सड़क दुर्घटना में कई बार दाँत टूट जाते हैं। ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए?
डॉ. सचिन: यह Dental Emergency है। यदि स्थायी दाँत पूरी तरह बाहर निकल गया है: दाँत को केवल Crown वाले हिस्से से पकड़ें, जड़ को न छुएँ। यदि गंदा है तो हल्के से दूध या saline से साफ करें। रगड़ें नहीं। संभव हो और सुरक्षित हो तो उसे तुरंत socket में वापस लगाया जा सकता है। ऐसा संभव न हो तो दूध या उपयुक्त storage medium में रखें। ऐसे में तुरंत डेंटिस्ट के पास जाएँ। सबसे महत्वपूर्ण है समय। Avulsed permanent tooth में जल्दी उपचार मिलने से दाँत बचने की संभावना बेहतर होती है। ध्यान रखें, दूध के दाँत को वापस socket में नहीं लगाना चाहिए।
शशि पारस: पाठकों का एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि आधुनिक दंत चिकित्सा कितनी महँगी है?
डॉ. सचिन: उपचार का खर्च कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे क्लिनिक की सुविधाएँ, इस्तेमाल होने वाला मटेरियल, तकनीक, केस की जटिलता और उपचार करने वाले चिकित्सक का अनुभव।
कुछ सामान्य indicative ranges इस प्रकार हैं जैसे –
* Scaling और Polishing: ₹1,500–₹3,000
* RCT:
₹4,000–₹8,000 प्रति दाँत।
* Zirconia Crown:
₹8,000–₹15,000 प्रति दाँत।
* Single Dental Implant: ₹25,000–₹45,000 या अधिक।
* All-on-4: लगभग ₹1.8 लाख–₹3.5 लाख या अधिक प्रति जबड़ा। ये केवल अनुमानित उदाहरण हैं, निश्चित बाजार दर नहीं। इम्प्लांट के खर्च में fixture, abutment, crown और अन्य आवश्यक प्रक्रियाएँ शामिल हैं या नहीं, यह पहले स्पष्ट कर लेना चाहिए। मेरी सलाह है कि केवल कम कीमत देखकर उपचार न चुनें। Sterilisation, material quality, सही diagnosis और treatment planning बहुत महत्वपूर्ण हैं।
शशि पारस: बहुत से लोग तभी डेंटिस्ट के पास आते हैं जब दर्द असहनीय हो जाता है। क्या यह सही तरीका है?
डॉ. सचिन: नहीं। यही सबसे बड़ी गलती है। कई दंत रोग शुरुआती अवस्था में बिना दर्द के विकसित होते हैं। इसलिए नियमित Dental Checkup जरूरी है। अधिकांश लोगों के लिए लगभग छह महीने का अंतराल उपयोगी हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों को उनकी जोखिम स्थिति के अनुसार अधिक जल्दी या देर से जाँच की जरूरत होती है। विशेष रूप से डायबिटीज, तम्बाकू सेवन, periodontal disease और इम्प्लांट वाले मरीजों को नियमित follow-up पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
शशि पारस: अंत में हमारे पाठकों के लिए आपकी दस सबसे महत्वपूर्ण सलाह क्या होंगी?
डॉ. सचिन: दिन में दो बार, दो मिनट Soft Brush और Fluoride Toothpaste से ब्रश करें। रोजाना Floss या Interdental Brush से दाँतों के बीच सफाई करें। मीठे खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों का बार-बार सेवन न करें।तम्बाकू, गुटखा, सुपारी और धूम्रपान से पूरी तरह दूर रहें। चाय-कॉफी और मीठे पेय के बाद पानी से कुल्ला करें। मसूड़ों से खून आने या मुँह से दुर्गंध को सामान्य न समझें। बच्चों के दूध के दाँतों की भी उचित देखभाल करें। दर्द न होने पर भी नियमित डेंटल चेकअप करवाएँ। दाँतों की समस्या में घरेलू नुस्खों और स्वयं दवा लेने से बचें। अपने प्राकृतिक दाँतों को बचाने को हमेशा प्राथमिकता दें।
आपकी मुस्कान आपकी पहचान है – एक अंतिम संदेश!
डॉ. सचिन: मैं सभी लोगों से यही कहना चाहूँगा कि दाँतों को केवल सुंदर मुस्कान का हिस्सा न समझें। ये हमारे पोषण, पाचन, बोलने और जीवन की गुणवत्ता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
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आज आधुनिक दंत चिकित्सा में लगभग हर प्रकार की समस्या का समाधान उपलब्ध है। चाहे दाँतों में कैविटी हो, मसूड़ों की बीमारी हो, टेढ़े-मेढ़े दाँत हों या पूरे जबड़े के दाँत गायब हों, आधुनिक तकनीकों से उपचार संभव है। लेकिन मेरा मानना है कि सबसे अच्छी Dentistry वह है, जिसमें मरीज का अपना प्राकृतिक दाँत सुरक्षित रखा जा सके। यदि दाँत बच सकता है तो उसे बचाने का प्रयास करना चाहिए। इम्प्लांट और अन्य विकल्प महत्वपूर्ण हैं, लेकिन प्राकृतिक दाँत का विकल्प नहीं हैं। एक स्वस्थ मुस्कान केवल सुंदरता नहीं, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य और आत्मविश्वास की पहचान है। अपने दाँतों की देखभाल कीजिए, क्योंकि स्वस्थ दाँतों के साथ ही स्वस्थ जीवन और आत्मविश्वास भरी मुस्कान संभव है।
तो यह थे देहरादून के अनुभवी दंत चिकित्सक डॉ. सचिन रस्तोगी के साथ हमारी विशेष बातचीत। इस बातचीत से स्पष्ट है कि दाँतों की समस्याओं को केवल उम्र, किस्मत या खानपान से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। सही जानकारी, नियमित देखभाल और समय पर उपचार से अधिकांश दंत समस्याओं को रोका जा सकता है।
या उनका प्रभावी उपचार किया जा सकता है। पहले लोग मानते थे कि दाँत खराब हो जाएँ तो उन्हें निकलवाकर नकली दाँत लगवा लेना ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन आधुनिक दंत चिकित्सा का पहला सिद्धांत है, प्राकृतिक दाँत को बचाना। और यदि दाँत खो भी जाए, तो आधुनिक Implant Dentistry से उसे प्रतिस्थापित करने के प्रभावी विकल्प उपलब्ध हैं।
दाँतों को केवल मुस्कान के लिए नहीं, अपनी पूरी सेहत के लिए बचाइए।
नोट: (यह साक्षात्कार सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से है। प्रत्येक मरीज की स्थिति अलग होती है। किसी भी उपचार से पहले किसी अच्छे योग्य पंजीकृत दंत चिकित्सक से ही व्यक्तिगत जाँच और परामर्श अवश्य लें। – शशि भूषण मैठाणी पारस )
यदि आप चाहें तो दांतों से जुडी किसी भी समस्या व समाधान हेतु देहरादून में स्थित डॉ. सचिन रस्तोगी जो वर्ष 2002 से दंत चिकित्सा के क्षेत्र में सक्रिय हैं, से सम्पर्क कर सकते हैं। इनके देहरादून स्थित Rastogi Dental Clinic राजपुर रोड़ में आधुनिक तकनीक के साथ दंत उपचार सेवाएँ प्रदान की जाती हैं। क्लिनिक में डेंटल इम्प्लांट, रूट कैनाल, लेजर डेंटिस्ट्री सहित विभिन्न आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
Rastogi Dental Clinic, Dehradun
इनकी आधिकारिक वेबसाइट है : www.rastogidentalclinic.com
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संवाद प्रस्तुतकर्ता : Shashi Bhushan Maithani Paras
सामाजिक मुहिम : आपका डॉक्टर, आपके द्वार!
मोब. 7060214681
यूथ आइकॉन हेल्थ टॉक, देहरादून