एतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान के समाचार पत्र मेरे पास आज भी हैं सुरक्षित । अमर उजाल । *शशि भूषण मैठाणी 'पारस'

Youth icon yi Media logoAndolan : जब लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ लोगो के मानस पटल पर इतिहास उकेर रहा था…!

*वहीं उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह का तानाशाह रवैया तब लोकतंत्र के अध्याय में एक काला इतिहास जोड़ रहा था ..।

Writen By: Shashi Bhushan Maithani ‘Paras’ Founder & Director Youth icon Yi National Media Award. यहां राजनेताओ की कम और मीडिया की सकारात्मक भूमिका पर ध्यान देना जरूरी है । 90 के दशक की वह जन क्रान्ति एक इतिहास लिख गयी है। उस वक्त आन्दोलन को व्यापक रूप देने में भी मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है स्थानीय स्तर पर छपने वाले पत्र -पत्रिकाओं की सहभागिता ने बेशक आन्दोलन को पैनी धार दी हो लेकिन तब त्वरित सन्देश वाहक की जो भूमिका मेेरठ से प्रकाशित होने वाले अमर -उजाला और दैनिक जागरण समाचार पत्रों ने निभाई उसी के चलते तत्कालीन मुलायम सरकार ने इनके खिलाफ हल्ला बोल आन्दोलन शुरू करवा दिया था। तब दोनो पत्रो के सरकारी विज्ञापन भी रोक दिए गए थे । और जहां तहां सपाईयों ने इन अखबारों की होली जलानी शुरू कर दी । बावजूद समाचार पत्र अपने सरोकारों के सापेक्ष पर्वत वासियों के हक में मुस्तैदी से डटे रहे।
Writen By: Shashi Bhushan Maithani ‘Paras’ Founder & Director Youth icon Yi National Media . यहां राजनेताओ की कम और मीडिया की सकारात्मक भूमिका पर ध्यान देना जरूरी है । 90 के दशक की वह जन क्रान्ति एक इतिहास लिख गयी है। उस वक्त आन्दोलन को व्यापक रूप देने में भी मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है स्थानीय स्तर पर छपने वाले पत्र -पत्रिकाओं की सहभागिता ने बेशक आन्दोलन को पैनी धार दी हो लेकिन तब त्वरित सन्देश वाहक की जो भूमिका मेेरठ से प्रकाशित होने वाले अमर -उजाला और दैनिक जागरण समाचार पत्रों ने निभाई उसी के चलते तत्कालीन मुलायम सरकार ने इनके खिलाफ हल्ला बोल आन्दोलन शुरू करवा दिया था। तब दोनो पत्रो के सरकारी विज्ञापन भी रोक दिए गए थे । और जहां तहां सपाईयों ने इन अखबारों की होली जलानी शुरू कर दी । बावजूद समाचार पत्र अपने सरोकारों के सापेक्ष पर्वत वासियों के हक में मुस्तैदी से डटे रहे।

पेड न्यूज और घोर व्यवसायिकता के आरोप झेल रहे (मीडिया) चौथे स्तम्भ का वर्तमान के घेरे में है। लेकिन उत्तराखण्ड राज्य के उदय में अगर प्रिंट मीडिया की भूमिका की ईमानदार समीक्षा की जाय तो तस्वीर का सुनहरा स्वरूप सामने आता है , 90 के दशक में जब पहाड़ो में पृथक राज्य की मांग के स्वर मुखर होने लगे थे तब केन्द्र में जमी कांग्रेस की नरसिम्ह राव सरकार से लेकर उ0प्र0 की सत्ता पर काबिज मुलायम सरकार तक सचेत हो गयी थी ।

2 अक्टूवर 1994 को मुजफ्फर नगर और नारसन में हुए भीषण गोलीकांड से लोकतंत्र के वीभत्स रूप को देख शायद ही उस दिन अहिंसा के पुजारी बापू के मुखड़े पर प्रसन्नता और आंखो में चमक की कोई प्रासंगिकता रही होगी । यकीनन बापू की आत्मा भी उस दिन जार -जार रोई होगी । 2 अक्टूबर को घटी घटना ने लोकतंत्र के चरित्र को शर्मसार कर गर्त में गिरा दिया था और लोकतंत्र के इस काले अध्याय का खलनायक बना उ0प्र0 का तत्कालीन मुख्यमंत्री ।

एतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान के समाचार पत्र मेरे पास आज भी हैं सुरक्षित । अमर उजाल । *शशि भूषण मैठाणी 'पारस'
एतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान के समाचार पत्र मेरे पास आज भी हैं सुरक्षित । अमर उजाला ।
*शशि भूषण मैठाणी ‘पारस’

पेड न्यूज और घोर व्यवसायिकता के आरोप झेल रहे (मीडिया) चौथे स्तम्भ का वर्तमान के घेरे में है । लेकिन उत्तराखण्ड राज्य के उदय में अगर प्रिंट मीडिया की भूमिका की ईमानदार समीक्षा की जाय तो तस्वीर का सुनहरा स्वरूप सामने आता है,  90 के दशक में जब पहाड़ो में पृथक राज्य की मांग के स्वर मुखर होने लगे थे तब केन्द्र में जमी कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार से लेकर उ0प्र0 की सत्ता पर काबिज मुलायम सरकार तक सचेत हो गयी थी। शुरूवाती चिंगारियों को बल पूर्वक दबाने के सरकारी उपाय जब थोपे साबित हुए तो उ0प्र0 की मुलायम सरकार ही मोर्चे पर आ डटीे थी । फिर क्या था! तब मसूरी ,श्रीनगर ,खटीमा ,देहरादून समेत मुजफर नगर के जघन्य काण्डों को पुलिस द्वारा अंजाम दिया गया  । स्वतंत्र भारत में अहिंसक आन्दोलन को वीभत्स तरीके से दबाने के ऐसे उदाहरण इतिहास में बहुत कम हेै ।

एतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान के समाचार पत्र मेरे पास आज भी हैं सुरक्षित । अमर उजाल । *शशि भूषण मैठाणी 'पारस'
एतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान के समाचार पत्र मेरे पास आज भी हैं सुरक्षित । दैनिक जागरण  ।
*शशि भूषण मैठाणी ‘पारस’

तब केंद्र की राव सरकार के अघोषित समर्थन से उ0प्र0 की मुलायम सरकार ने हिमालय की पहाड़ियों पर जो कोहराम बरपाया वह आन्दोलनकारियों के मनोबल को तोड़ने की एक सोची समझी कसरत थी । हो सकता था कि सत्ता की बन्दूके राजधर्म की सारी सीमाए तोड़ डालती लेकिन उसी वक्त तमाम अखबार सरकारी तांडव के खिलापत हो गए थेे । खासकर अमर उजाला और दैनिक जागरण उन दिनों पर्वतीय ईलाको में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबार थे । ये दोनो अखबार तब मेरठ से प्रकाशित होतेा थे । और उत्तराखंड में पहाड़ की आवाज बन कर लोगो के दिलो में बस गए । इतना ही नही समाचार पत्रों ने अपने व्सवसायिक हितोें को ताक पर रख कर पुलिस के काले कारनामों को मुखरता से कवर किया । आज तो राज्य हमारे सामनेें है उसकी प्राप्ति में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का अहम योगदान रहा है । तब मीडिया के महा कवरेज की परिणीती आज उत्तराखंड राज्य हमारे सामने है । वो बात अलग है कि हमारे नेताओं की महत्वकाक्षाएं  इस राज्य का बेड़ा गर्क कर रही है।

एतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान के समाचार पत्र मेरे पास आज भी हैं सुरक्षित । अमर उजाल । *शशि भूषण मैठाणी 'पारस'
एतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान के समाचार पत्र मेरे पास आज भी हैं सुरक्षित । दैनिक जागरण ।
*शशि भूषण मैठाणी ‘पारस’

आज यहां राजनेताओ की कम और मीडिया की सकारात्मक भूमिका पर ध्यान देना जरूरी है । 90 के दशक की वह जन क्रान्ति एक इतिहास लिख गयी है । उस वक्त आन्दोलन को व्यापक रूप देने में भी मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है,  स्थानीय स्तर पर छपने वाले पत्र -पत्रिकाओं की सहभागिता ने बेशक आन्दोलन को पैनी धार दी हो लेकिन तब त्वरित सन्देश वाहक की जो भूमिका मेेरठ से प्रकाशित होने वाले अमर -उजाला और दैनिक जागरण समाचार पत्रों ने निभाई उसी के चलते तत्कालीन मुलायम सरकार ने इनके खिलाफ हल्ला बोल आन्दोलन शुरू करवा दिया था । तब दोनो पत्रो के सरकारी विज्ञापन भी रोक दिए गए थे । और जहां-तहां सपाईयों ने इन अखबारों की होली जलानी शुरू कर दी । बावजूद समाचार पत्र अपने सरोकारों के सापेक्ष पर्वत वासियों के हक में मुस्तैदी से डटे रहे।

इसलिए आज यह कहने में कोई गुरेज नही कि लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ अपनी सकारात्मक भूमिका के चलते आम जनमानस के सामने अपने शानदार इतिहास का साक्षी लोगो के मानस पटल पर मानों इतिहास उकेर रहा था । वहीं उ0प्र0 में मुलायम का तानाशाह रवैया तब लोकतंत्र के अध्याय में एक काला इतिहास जोड़ रहा था । हालांकि इस दर्मियान कई धारणाएं नेस्तनाबूत भी हों गयी थी ।

लेकिन उत्तराखण्ड के मूल सवाल आज भी अपनी जगह कायम है । ये बताने की जरूरत नही होनी चाहिए कि राजनेताओं और यहां के नौकरशाहों ने वर्तमान में इस राज्य को अपनी एसगाह का अडा बना दिया है । दूसरी और राज्य बनते ही यहां का मीडिया भी खूब फल फूल गया हजारों पत्र- पत्रिकाएं बाजार की रेस में है । इनमें से कुछेक ही अपने पत्रकारिता धर्म को निभा रहे है भले ही आज इस राज्य में ज्यादातर मीडिया से जुड़े संस्थान आम जनता की आवाज कम और नेताओं के उर्जा के स्रोत ज्यादा बनते जा रहे है लेकिन,  बहुत से पत्रकार ऐसे भी है जो निष्पक्षता के साथ पत्रकारिता धर्म का पालन कर रहे है ।वर्तमान में उत्तराखंड राज्य आपदा के जख्मों से कराह रहा है और इस वक्त राज्य वासियों को एक ही चिंता सता रही है कि आपदा के नाम पर राज्य का पुननिर्माण कहीं भ्रष्टाचार की नींव पर तो नहीं किया जा रहा है ? ऐसे में अब एक बार फिर राज्य वासियों की अपेक्षा मीडिया  से ज्यादा बढ़ गयी है जो इस पर चौकस निगाह रख सकती है ।

* शशि भूषण मैठाणी ‘पारस’ ,  एडिटर Yi मीडिया । संपर्क – 9756838527, 7060214681   

Copyright: Youth icon Yi National Media, 02.10.2016

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By Editor

13 thoughts on “Andolan : जब लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ लोगो के मानस पटल पर इतिहास उकेर रहा था…!”
  1. मैथानी जी इस प्रदेश को दलाल पत्रकारीता से मुक्त करना होगा

  2. अब तो ऐसा लगता है कि लोगो ने व्यर्थ ही अपने प्राणों की आहुति दी
    क्या मिला जनताको हाँ नेटोकि जरूर पैसे की खदान बन गया प्रदेश

  3. बिल्कुल सही कहा निशा जी आज का राज्य उस आंदोलन की मूल अवधारणा से इतर है ।

    1. धन्यवाद भाईसाहब पर् आज कि दलगत राजनीति दसिख कर सच में बलिदान होने वाली आत्माओं को जरूर कष्ट होता होगा
      राज्य को नेताओ नेअपनी निजी संपत्ति समझ लिया है

  4. शशी भूषण मैठाणी ‘पारस’ भाई साहब जी सही कहा आपने उस समय मुलायम सरकार ने जो घिनोनी हरकत की उससे तो गाँधी जी की आत्मा को भी अवश्य चोट पहुँची होगी,साथ ही इस भारत वर्ष के अच्छे नागरिको को जो कष्ट हुआ उसे शब्दों मे व्यक्त नहीं किया जा सकता, मैं और मेरा परिवार उस घटना मे शहिदों की आत्मा की शान्ति के लिए हमेशा भगवान से प्रार्थना करता है,ऊँ शान्ति।

  5. Tb k log bhole Imandar jaldi se bharosa krne wale hmare pahad wash! Aj unk! Badolt hm yaha h…mgr ab agr mulaym ho ya pura ka pura uttar pardesh….ab agr uttrakhand k rewash!yon pr ungl! Uth! To up h! Saaf kr denge….mana k! Up k! Jan sankhya jyada h mgr sero ko jhund ma! V s!kar marne ka hunar hmesa rehta h wo dor alag tha jb hmare bha!yon pr hua….are up or mulaym hath!yar k dum pe ladne wale agr tmhre bajuo ma! Dum hota to b!na hath!yar k ladte…..mgr ab agr a!sa hua to mulaym k! Dhart! Ma! S!rf laal m!tti hog! Or ujade hue ghar….ab hm uttarakhand k wash! Wo dor k mat smjhna….??

  6. उत्तराखंड राज्य स्थापना की लड़ाई के लिए शहीद हुए लोगों को इस तरह हमेशा ही याद किया जाता रहेगा ।

  7. DO you have more news paper of that time , I need my photograph during this moment;

  8. Ek bhi Patrika ya media tant satynishth ho to koyee bhee aparadhik pravriti ka vyakti jaghanya aparadh ko karane se pahile 10 baar sochta hai. Par bikaaoo pravriti ke log tikaoo hal de hee nahee sakte.
    Purane samay me kalam ke mukh par sarswati ka vas hota tha Galat likhne se chooktee thee. Ab kalam ke mukh par laxmi ka vaas hone se galat likhne me zara bhi sankoch nahee karti. Ant sab dekh hi rahe honge. Bade bade Neta, Shashkeey Tantr ke log ant me jail jaate hi hain. Jeevan bhar kee batoree shauharat, jhooti ijjat sab mitiya mel ho jaati hai. Onkar

  9. es saramnaak gatna ko bulna nahi chahiye jab tak yese tana saho ko saza na mil jaye

  10. बहुत ही दुःखद धटना
    डबल इंजन की सरकार ने
    अब दुबारा सीबीआई जांच करनी चाहिए जिल्द से आरोपियों को फांसी के फंदे तक पहुचना चाहिए

  11. उत्तराखंड के शहीदों को कोटि-कोटि नमन 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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