Meharban sarakar : कैबिनेट ने दी है इन प्रस्तावों को हरी झंडी ।  व्यापारियों और बिल्डरों पर हुई सरकार मेहरवान YOUTH ICON report .

उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन के बाद कौन फहराएगा 26 जनवरी का तिरंगा ! पढ़ें आगे विस्तार से । (कृपया पोस्ट को पूरा पढ़ने के बाद ही किसी निष्कर्ष तक पहुंचें )

 

 

उत्तराखंड राज्य में 9 महीने पहले सत्ता को हाथ में लेने वाले त्रिवेन्द्र रावत के हाथ से अब सत्ता छिन जाएगी । फिर 26 जनवरी को नए मुख्यमंत्री ही तिरंगा फहराएंगे । ऐसे नाम जो जनता को आश्चर्यचकित करेंगे उनके नाम भी चर्चाओं में हैं कि वह भी नए मुख्यमंत्री के रूप में चुने जा सकते हैं । खैर …! यहां पर बता दें कि फिलहाल बनने वाली नई सरकार का ढांचा पूरी तरह से तैयार है । दिन से लेकर रात में किसी भी वक़्त अगले कुछ घंटों के अंदर एक सादे समारोह में नए निजाम को शपथ दिलाकर सत्ता की चाबी भोर से पहले सौंपी जा सकती है । इसके लिए कयासबाजी के दौर भी जारी हो चुके हैं ।

शशि भूषण मैठाणी ‘पारस’

26 जनवरी पर्व आने में महज कुछ ही घंटे बाकी रह गए हैं । लेकिन प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के लिए जोरदार तैयारी शुरू है, नया मुख्यमंत्री कौन होगा ? कौन गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराएगा ? इसे जानने के लिए सबमें उत्सुकता बनी हुई है । नए मुख्यमंत्री के साथ-साथ नई कैबिनेट का भी खाका तैयार कर लिया गया है । अनेक वरिष्ठ नेताओं को कैबिनेट मंत्रियों की सूची में शामिल कर लिया गया है । वर्तमान में सरकार से नाराज मंत्रियों को भी बाहर कर दिया गया है, उनके नामों का भी खुलाशा हो गया है ।
चर्चा है कि, वह भी कल…! यानी 26 जनवरी को उत्तराखंड राज्य में 9 महीने पहले सत्ता को हाथ में लेने वाले त्रिवेन्द्र रावत के हाथ से अब सत्ता छिन जाएगी । फिर 26 जनवरी को नए मुख्यमंत्री ही तिरंगा फहराएंगे । ऐसे नाम जो जनता को आश्चर्यचकित करेंगे उनके नाम भी चर्चाओं में हैं कि वही भी नए मुख्यमंत्री के रूप में चुने जा सकते हैं । खैर …! यहां पर बता दें कि फिलहाल बनने वाली नई सरकार का ढांचा पूरी तरह से तैयार है । दिन से लेकर रात में किसी भी वक़्त अगले कुछ घंटों के अंदर एक सादे समारोह में नए निजाम को शपथ दिलाकर सत्ता की चाबी भोर से पहले सौंपी जा सकती है । इसके लिए कयासबाजी के दौर भी जारी हो चुके हैं ।

Meharban sarakar : कैबिनेट ने दी है इन प्रस्तावों को हरी झंडी ।  व्यापारियों और बिल्डरों पर हुई सरकार मेहरवान YOUTH ICON report .
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत । फाईल:  फोटो ।

फिलवक्त पूरा प्रदेश टकटकी लगा कर 9 माह पूर्व गठित हुई सरकार के बाद नई सरकार और उसके मुखिया को देखने की उत्सुकता में है । यहां पर स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि यह भारतीय जनता पार्टी के हाईकमान या प्रधानमंत्री मोदी के निर्देशों से नहीं हो रहा है, बल्कि यह सब उत्तराखंड के बैठे ठाले व्हाट्सप, फेसबुकियों के आधार पर सत्ता संचालित हो रही है । आज इनकी बिरादरी के लोग पूरी दुनिया में समानांतर सत्ता चलाते हैं । निर्णय लेते हैं और देते हैं । जीडीपी से लेकर सेंसेक्स तक को प्रभावित करते हैं । इनकी अदालत में बिना सबूतों के ही किसी भी व्यक्ति को लांछित कर दिया जाता है । जब मन आए तब किसी भी व्यक्ति को भ्रष्टाचारी , व्यभिचारी तक के आरोपों में घसीट दिया जाता है । और ये जिसे चाहें उसे क्लीन चिट भी दे देते हैं । आप इन्हें प्रमाण पत्र बांटने वाली संस्था के लोग भी मान सकते हैं । क्योंकि इन्हें बोलने और लिखने का बेरोकटोक अधिकार प्राप्त है । अब उसी मौलिक अधिकार के अस्त्र का प्रयोग कर ये सूबे को नया निजाम देने जा रहे हैं । यकीन न हो तो अपने फेसबुक व्हाट्सप को खंगालिए जहां इन परजीवियों ने एक हफ्ते पहले से ऐलान किया हुआ है कि 26 जनवरी को उत्तराखंड में नया मुख्यमंत्री तिरंगा फहराएगा ।
राज्य निर्माण के बाद जिस तरीके से फेसबुकियों की बाढ़ आई है उसमें किसी भी क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति की छवि आलोचना आरोपों में बदली जा रही है जिसके मुख्य कारण ये परजीवी ही हैं ।

कुंठाग्रस्त लोगों ने अपनी भड़ास उतारने का  जरिया बना लिया इस माध्यम को : 

अफशोस कि व्यक्ति अपनी निजी भड़ास व कुंठा को बहुत ही साहित्यिक तरीके से लिखकर जनता की आवाज बनने की कोशिश कर रहा है । पहाड़ों से बीमारी का बहाना बनाकर फर्जी मेडिकल बनाकर, तो कभी अटैचमेन्ट की अटैची थामे जुगाड़ू प्रक्रिया से या अपने ऐशोआराम के लिए मैदानों में पसरे लोग पलायन पर या पहाड़ों के विकास के नाम पर अपना गला साफ कर  सरकारों को घेरते हैं । कई निट्ठल्ले लोग जनता को उद्यमिता का पाठ भी पढ़ा रहे हैं । खुद दलाली करने को हर वक़्त आतुर व्यक्ति या जिनके पैर भ्रष्टाचार में सने रहे हैं वो आज फेसबुक सोशल मीडिया  के मार्फ़त अन्ना हजारे को मार्गदर्शन दे रहे हैं ।

जी हां हम कहना चाहते हैं कि जिस तरीके से सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में लोग अपने कुछ खास मित्रों को मजाक के रूप में प्रभावित करते थे या कुछ गंभीर लोग सोशल मीडिया के मार्फत अपनी बात को समाज के सामने रखते थे । मगर आज सोशल मीडिया को जिस तरीके से समाज के एक बड़े नकारात्मक हिस्से ने अपनी चपेट में ले लिया है, वह नासूर का रूप लेता जा रहा है । बेलगाम होते जा रहे इस वर्ग को समय रहते रोकना बेहद आवश्यक भी है ।

आप देखते होंगे कि स्तरीय और पहली नजर की खबर के आधार पर अपना मन बनाने वाले लोगों को ये अपना शॉफ्ट टारगेट मानने लगे हैं । और इनकी हल्की फुल्की जो गैर गंभीर पोस्ट होती हैं उससे समाज में कितना गहरा वह नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है उसकी ये एक बानगीभर है ।

हमने जो शीर्षक दिया है, राज्य में नेतृत्व परिवर्तन का उसका सच्चाई से कोई सरोकार नहीं है : 

जो आज हमने शीर्षक दिया है कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है, उसका सच्चाई से कोई सरोकार नहीं है । यह भारतीय जनता पार्टी और उनके नेतृत्व का विषय है । मगर उत्तराखंड के कुछेक फेसबुकिए आए दिन मुख्यमंत्रियों का बदलाव करते आ रहे हैं । ये अपनी पसंद और अपने चयन का मुख्यमंत्री बनाते हैं ।

अच्छे और गम्भीर लोग भी मौजूद हैं फेसबुक पर लेकिन नकारात्मक सोच वालों ने उन्हें हासिए पर रख दिया है : 

ऐसा नहीं है कि जितने भी सोशल मीडिया पर पत्रकार लेखवार बने है उन सबको हम एक ही तराजू में नाप रहे हैं । फेसबुक आने के बाद यह भी सच है कि बहुत सारी छुपी हुई प्रतिभाओं का पदार्पण हुआ है । अच्छे अच्छे स्तरीय लेखकों बुद्धिजीवियों को समाज में अच्छी खासी पहचान मिली है । लेकिन इसी जगह पर अधिसंख्य नकारात्मक विद्वानों की जड़ बहुत गहरे तक जम चुकी है । इनकी मंडली सुनियोजित तरीके से किसी की छवि बनाने या बिगाड़ने का काम भी कर बड़ी चालाकी से कर रहे हैं । सोशल मीडिया पर तथाकथित विद्वानों, राजनीतिज्ञों, व सामाजिक चिंतकों की भी बाढ़ आ गई है । कॉपी पेस्ट लेखकों की तो पूछो मत । जिनका काम समाज में जहर घोलने व समाज को भ्रमित करने एक एजेंडे के तहत है । किसी के अच्छे साकारत्मक कार्यों के प्रति नई पीढ़ी में एक गलत व भ्रामक नकारात्मक माहौल बनाने का चलन चल पड़ा है । क्योंकि इसका कारण भी जब आप नकारात्मक होते हैं तो प्रतिक्रिया स्वरूप लाईक कमेंट्स की तादात भी अच्छी होती है जिससे कुंठित मानसिकता वाले बांछे खिल जाती है । 

ऐसा नहीं है कि जितने भी सोशल मीडिया पर पत्रकार लेखवार बने है उन सबको हम एक ही तराजू में नाप रहे हैं । फेसबुक आने के बाद यह भी सच है कि बहुत सारी छुपी हुई प्रतिभाओं का पदार्पण हुआ है । अच्छे अच्छे स्तरीय लेखकों बुद्धिजीवियों को समाज में अच्छी खासी पहचान मिली है । लेकिन इसी जगह पर अधिसंख्य नकारात्मक विद्वानों की जड़ बहुत गहरे तक जम चुकी है ।

हम भले ही कोशिश जरूर करते हैं उन्हें अनदेखा करने की मगर उनका सिंडीकेट इस तरह से जड़ें जमा चुका है कि वह प्रतिदिन खबरें पढ़ते ही बिना उसकी गहराई में गए व्यक्तियों, संस्थानों, सत्ता पक्ष हो या विपक्ष को कोसना शुरू कर देते हैं, या अपने चहेतों का आंख बंद कर बचाव भी शुरू कर देते हैं । इसमें दोनों ही पक्ष शामिल हैं ।

स्थापित मीडिया को दिखाने लगे हैं आंखे : 

अब फेसबुकियों और सोशल मीडिया पर इन परजीवियों का स्तर इतना मजबूत हो चुका है कि यह स्थापित मीडिया के प्रमाणित अंग प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी आंखें दिखाने लगा है । इतना ही नहीं कभी-कभी एक वास्तविक कर्मठ जुझारू व प्रमाणित पत्रकार की पारखी पत्रकारिता को भी झूठा साबित करने की पूरी मेहनत कर रहा है । सोशल मीडिया का यह परजीवी अपनी जी जान से तथ्यों के साथ रिपोर्ट तैयार करने वाले पत्रकारों को भी अब प्रमाण पत्र देने का अधिकारी बन गया है ।
कभी तो इनके द्वारा खबरों का पोस्टमार्टम जिस तरीके से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर किया जाता है वह समझ से परे है । दुर्भाग्य की बात है कि निरंतर Facebook पर वह जहर उगलते हैं या अपना पोपला ज्ञान उड़ेलते हैं । कई श्रीमान ऐसे हैं जिन्होंने किसी पत्रकारिता संस्थान की दहलीज पर पैर तक नहीं रखा और वह खुद को फेसबुक की पोस्टों के दम वरिष्ठ पत्रकार भी कहने लगे यह स्वयं को मीडिया में स्थापित व्यक्ति भी कहने लगे हैं , जबकि पत्रकारिता से इनका दूर-दूर तक का कोई सरोकार नहीं रहा है और ना है और इस बात का पता ऐसे लोगों की पोस्ट को देखकर और पढ़कर लगाया जा सकता है ।

आज ही इस पोस्ट को लिखने का मुझे सबसे उपयुक्त समय इसलिए लगा, क्योंकि पिछले हफ्ते दस दिन से भिन्न-भिन्न फेसबुक पोस्ट के मार्फ़त पता चला कि 26 जनवरी को नया निज़ाम सूबे में तिरंगा फहराएगा । अब 26 जनवरी सामने है लेकिन फेसबुकियों की पोस्ट भी गायब हो गई । सत्ता जस की तस चल रही है ।  सवाल यह कि आखिर कौन और क्यों किस मकसद से इस तरह का माहौल को बीच-बीच में तैयार करवाता  है ? जाहिर सी बात है कि फेसबुक यूजर को मोदी या अमित शाह तो नहीं बताते होंगे ! लेकिन फिर भी कोई जरूर है जो अपने  स्वार्थ पूर्ति के लिए ऐसा माहौल अपने चेलों से गरमाते होंगे । आए दिन ऐसा होने से  सोशल मीडिया की साख अब तेजी से गिरते जा रही है । इसलिए फेसबुक पर रचनात्मक बुद्धिजीवी यूजर को भी अब अधिक जिम्मेदारी के अपना मत रखना होगा, और नकारात्मक लोगों को खारीज़ करना होगा । 

कुछ – कुछ यह उसी तरह का स्वरूप अब हो चला है ब्लैक मेलिंग का, जिस तरह से कुछेक लोग जनहित याचिकाओं और सूचना के अधिकार का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में मात्र किसी को नीचा दिखाने पैसा वसूलने या दलाली के लिए करते हैं । बिल्कुल उसी तरह का अब यह नया माध्यम हो गया है कि आप आए दिन ऐसे मामलों की पड़ताल करती खबरों को स्थापित मीडिया के अलावा गूगल में सर्च करके पढ़ सकते हैं । इस परजीवियों का अपनी पोस्टों के द्वारा किसी को प्रभावित करना या उसकी छवि को धूमिल करना नियति हो गई है ।

चिंता का विषय यह है कि जब तक देश में ऐसा कानून नहीं आ जाता है कि हर वो व्यक्ति सोशल मीडिया के विभिन्न अंगों में जो पोस्ट तथ्यहीन लिख रहा है, समाज में विकृति लाने का काम कर रहा है के ऊपर उसकी स्वयं की जिम्मेदारी होगी साथ ही जरूरत पड़ने पर वह व्यक्ति तथ्य प्रस्तुत भी करेगा, जैसे कि जिम्मेदार प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों के लिए भी कानून मौजूद है । बिना कानून के अभाव में देश में जिम्मेदार मीडिया के समानांतर गैर जिम्मेदार परजीवी मीडिया की जड़ें गहरी होती चली जा रही हैं और उसका विद्रूप रूप वर्तमान में हम सबके सामने है ।

यूथ आइकन मीडिया एक मिशनरी मीडिया है जो सामाजिक बदलाव और सामाजिक रचनात्मकता का अग्रणी मंच भी है जो सामान्य खबरों की पत्रकारिता से दूर रहकर प्रेरक व रचनात्मक पत्रकारिता को तवज्जो देता आया है । इस मंच पर हमेशा ईमानदार , कर्तव्यनिष्ठ, रचनात्मक पत्रकारों व लेखकों के अलावा सोशल मीडिया के वास्तविक लेखकों का जो अपनी अपनी रचनात्मक व जन सरोकारों से जुड़ी छोटी-छोटी व महत्वपूर्ण जानकारियों को समाज के साथ साझा भी करते हैं ।
आज मैं अपनी इस रिपोर्ट के माध्यम से केवल यह कहना चाहता हूँ कि तथ्यों से परे सोशल मीडिया के स्क्रीन जिस तरीके से भरे रहते हैं जिस तरह से झूठी हुआ आधारहीन सूचनाओं से जनता को दिग्भ्रमित किया जाता है, और उन जूठी खबरों से चलने वाली चाय की दुकान से लेकर सत्ता प्रतिष्ठानों के आंगन तक पहुंच जाती है, इसका प्रभाव सत्ता पक्ष पर विपक्ष पर और शासन को चलाने वालों पर खूब पड़ता है । आए दिन सरकारी मशीनरी भी इससे प्रभावित हो रही है ।

इस पोस्ट का मकसद सत्ता पक्ष या विपक्ष को प्रोत्साहन देना नहीं है : 

आज की इस पोस्ट का उद्देश्य किसी सरकार को स्थिर या अस्थिर करना नहीं है । और न ही  विपक्ष को घेरना या बचाना है ।  इसलिए मैं आज इस पोस्ट के मार्फत बताना चाहता हूँ कि आज जो गैर जिम्मेदार मीडिया जिम्मेदार मीडिया के समानांतर मीडिया के बराबर में खड़ा हुआ है  , यह मीडिया नकारात्मक रूप से किसी व्यक्ति विशेष से लेकर सरकारों को बनाने या गिराने की हैसियत तक जा पहुंचा है । जिसका ईलाज कानूनी रूप से सही वक्त पर होना बेहद आवश्यक है ।

लेकिन बात सिर्फ सोशल मीडिया की ही नहीं है:

 स्थापित जिम्मेदार मीडिया की आड़ में भी अधिसंख्य पत्रकार भी सत्ता बनाने या गिराने से लेकर दलाली के दलदल में धंस चुका है । हम जिम्मेदार मीडिया के सदस्य  दूसरों पर ही सवाल नहीं खड़े कर सकते हैं । बल्कि सबसे पहले मुझे और आपको भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझना होगा । और इस सुंदर स्तंभ के पायों में चिपक रही दलाल रूपी दीमकों को भी स्वयं ही झाड़ने की शुरुआत करनी होगी । अन्यथा दलालों की दलाली के लिए स्थापित मीडिया सबसे मुफ़ीद अड्डा बनता जा रहा है जिसकी राह पर सोशल मीडिया के परजीवी तथाकथित पत्रकार भी चल पड़े हैं ।

* शशि भूषण मैठाणी ‘पारस’
SHashi Bhushan Maithani Paras

रचनात्मक पोस्ट भेजें, संपर्क करें :- 9756838527

By Editor