सोनाकली सबको मायूस कर गईं! सोनाकली की अंतिम विदाई के वक़्त वहाँ मौजूद सभी लोगों की आँखे नम थी। यह विदाई..एक ऐसी साथी की, जिसने
हमेशा अपना कर्तव्य बेहद ईमानदारी से निभाया! सबका सम्मान किया कभी किसी को निराश नहीं किया। सबकी उम्मीदों पर खरा उतरने वाली सोनकली की विदाई की चर्चा हर तरफ है।
सोनकली सिर्फ एक नाम मात्र नहीं थी, सोना जंगल में इंसान और वन्यजीवों के बीच भरोसे की मिसाल थी और आज जब यह साथ छूटा तो सैकड़ों आँखों का नम होना भी स्वाभाविक था।
जंगल की दुनिया में कुछ रिश्ते शब्दों के मोहताज नहीं होते। वे विश्वास, संवेदना और साथ निभाने की खामोश भाषा में आकार लेते हैं। उत्तराखंड के रामनगर स्थित कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की लगभग 80 वर्षीय हथिनी सोनाकली की विदाई भी एक ऐसे ही आत्मीय रिश्ते का अंत है, जिसने दशकों तक जंगल और इंसान के बीच एक मजबूत सेतु का काम किया। 17 अक्टूबर 2026 की रात करीब 10:45 बजे सोनाकली ने अंतिम सांस ली। 1997 में कॉर्बेट का हिस्सा बनी सोनाकली ने अपना लंबा जीवन जंगल की सेवा और वन्यजीव संरक्षण को समर्पित किया। 2018 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उसकी देखभाल में कोई कमी नहीं आने दी गई। उसकी उम्र और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए वनकर्मी उसकी देखरेख करते रहे। वह अब सरकारी अभियानों में भले ही हिस्सा नहीं लेती थी, लेकिन कॉर्बेट परिवार का हिस्सा बनी रही।
सोनाकली की पहचान केवल एक हथिनी की नहीं, बल्कि संकट के समय भरोसेमंद साथी की थी। वर्ष 2011 में गर्जिया क्षेत्र में आदमखोर बाघ के रेस्क्यू अभियान में उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2012 में बाघ के हमले में जान गंवाने वाले दीवानी राम के शव को बाघ के कब्जे से निकालने के अभियान में भी उसने साहस और सूझबूझ का परिचय दिया। वर्ष 2023 में सर्पदुली क्षेत्र के बाघ रेस्क्यू अभियान में भी उसका योगदान उल्लेखनीय रहा। जंगल की गश्त और कठिन अभियानों के दौरान उसने कई बार महावतों और अन्य वनकर्मियों की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाई।
इंसान अक्सर पशुओं को अपनी जरूरतों के नजरिये से देखता है, लेकिन सोनाकली का जीवन याद दिलाता है कि संवेदनशीलता, साहस और साथ निभाने का भाव केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है। जंगल में साथ बिताए वर्षों में महावतों और वनकर्मियों के साथ उसका रिश्ता महज काम का नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और अपनत्व का भी रहा।
18 अक्टूबर को वनकर्मियों ने सलामी देकर सोनाकली का पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। यह सम्मान केवल एक हथिनी को नहीं, बल्कि उस मूक साथी को विदाई थी, जिसने अपने जीवन से मनुष्य और पशु के बीच सामंजस्य की एक सुंदर कहानी लिखी।
सोनाकली अब कॉर्बेट के जंगलों में दिखाई नहीं देगी, लेकिन उसकी स्मृतियां उन लोगों के दिलों में जीवित रहेंगी, जिन्होंने उसके साथ समय बिताया। सोना की कहानी हमें यही सीख देती है कि प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता अधिकार का नहीं, सह-अस्तित्व, सम्मान और संवेदना का होना चाहिए।
अलविदा सोनाकली! तुम्हारी खामोश सेवा और इंसान के साथ तुम्हारे भरोसे का रिश्ता हमेशा याद रखा जाएगा।
® शशि भूषण मैठाणी पारस