शब्दों के उत्सव में चीड़ पत्तियों से रची कला ने खींचा ध्यान! मंजू शाह के हुनर में दिखीं पहाड़ की महिलाओं के स्वावलंबन और स्थानीय संसाधनों की नई संभावनाएँ।

Report : Shashi Bhushan Maithani "Paras"
Shashi Bhushan Maithani “Paras”

देहरादून में आयोजित किताब कौथिग में जाने का अवसर मिला। यह मेरे लिए पुस्तकों, लेखकों और विचारों से परिचित होने का एक अच्छा अवसर था। उत्तराखंड के इतिहास, कला, सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, परंपराओं, धार्मिक यात्राओं, संघर्ष, समर्पण, त्याग और बलिदान से जुड़ी पुस्तकों के बीच घूमते हुए मन बार-बार किसी न किसी किताब पर ठहर जाता था। लेकिन इस साहित्यिक आयोजन में एक ऐसी मुलाकात भी हुई, जिसने पुस्तकों से आगे बढ़कर प्रकृति, कला और स्वरोजगार की संभावनाओं की ओर मेरा ध्यान खींचा।

मैं अपने मित्र रमेश पेटवाल के साथ किताब कौथिग पहुँचा था। हम आयोजन के अंतिम दिन शाम के समय पहुँचे, इसलिए पूरे मेले की रौनक देखने का अवसर नहीं मिल पाया। कई स्टॉलों पर लोग अपनी किताबें और सामान समेटने की तैयारी में थे। फिर भी, जो कुछ देखने और समझने का अवसर मिला, वह अपने आप में यादगार रहा।


किताबों के स्टॉल देखते हुए मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। तभी मेरी नजर एक ऐसे स्टॉल पर पड़ी, जहाँ रखी कलाकृतियाँ पहली नजर में ही आकर्षित करने लगीं। ये कलाकृतियाँ किसी सामान्य सामग्री से नहीं, बल्कि चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियों यानी पिरूल से तैयार की गई थीं।
मैं उन कलाकृतियों को गौर से देख ही रहा था कि मन में एक सवाल आया। क्या यह वही मंजू शाह हैं, जिनके बारे में उत्तराखंड में ‘पिरूल वुमेन’ के नाम से चर्चा होती रही है?

मैंने स्टॉल पर मौजूद महिला से पूछा, आप कुमाऊँ मंडल की मंजू शाह तो नहीं हैं?

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा… हाँ सर, मैं ही हूँ।
यह सुनते ही मैंने तुरंत अपना कैमरा निकाला और उनके साथ एक सेल्फी ली। इसके बाद परिचय और बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। मुझे नहीं मालूम था कि मंजू शाह से यह मुलाकात इतनी आत्मीय हो जाएगी।


बातचीत के बीच उन्होंने कहा,… सर, मैं आपको सोशल मीडिया पर बहुत लंबे समय से फॉलो करती हूँ। आप मैठाणी जी हैं..?

उनकी इस बात से मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। हम पहली बार आमने-सामने मिले थे, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से वह पहले से मेरे काम और परिचय से वाकिफ थीं। एक ओर मैं उनकी कला को देखकर उनके बारे में जानने की उत्सुकता से उनके पास पहुँचा था, दूसरी ओर वह मुझे पहले से पहचानती थीं। मेरे मित्र रमेश पेटवाल ने भी बातचीत में मंजू शाह से कहा, मैडम, ये मैठाणी जी भी खुद में बड़े कलाकार हैं। ये अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय दर्जनों राजकीय विद्यालयों में इस विषय को पढ़ा चुके हैं। इस पर मंजू शाह ने कहा जी सर मैं जानती हूँ।

इस छोटी-सी बातचीत ने मुलाकात को और आत्मीय बना दिया। परिचय के औपचारिक दायरे से बाहर निकलकर बातचीत सीधे कला, अनुभव और रचनात्मकता पर केंद्रित हो गई।

चीड़ की पत्तियों में दिखाई दी रचनात्मकता
मंजू शाह के स्टॉल पर एक से बढ़कर एक सुंदर कलाकृतियाँ सजी थीं। चीड़ के पिरूल को जिस कल्पनाशीलता और धैर्य से उपयोगी तथा आकर्षक वस्तुओं में बदला गया था, वह देखने लायक था।

उत्तराखंड के पहाड़ी जंगलों में चीड़ की सूखी पत्तियाँ अक्सर वनाग्नि के खतरे से जुड़ी चर्चा का हिस्सा बनती हैं। लेकिन मंजू शाह ने इसी सामग्री को अपनी कला का आधार बनाया। उनके काम को देखकर महसूस हुआ कि प्रकृति में उपलब्ध किसी साधारण संसाधन को भी नई दृष्टि से देखा जाए, तो वह रचनात्मकता और आजीविका का माध्यम बन सकता है।
मैंने उनसे उनकी कला के बारे में बारीकी से जानकारी ली। पिरूल से तैयार होने वाली कलाकृतियों, उनके उपयोग और इस काम को आगे बढ़ाने की संभावनाओं को समझने की कोशिश की। उनके स्टॉल पर मौजूद वस्तुओं में मेहनत के साथ-साथ प्रकृति के प्रति एक अलग नजरिया भी दिखाई देता था।

पिरूल को कलात्मक रूप देना केवल हाथों का कौशल नहीं है। इसके लिए सामग्री की प्रकृति को समझना, उसे आकार देने की तकनीक सीखना, धैर्य के साथ काम करना और उपयोगी डिजाइन विकसित करना आवश्यक है। यही वजह है कि इस कला को केवल सजावटी वस्तुओं के निर्माण तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। इसके भीतर स्थानीय संसाधनों के उपयोग और ग्रामीण स्वरोजगार की संभावनाएँ भी मौजूद हैं।

मंजू शाह के काम की यही विशेषता मुझे सबसे अधिक महत्वपूर्ण लगी। पहाड़ में उपलब्ध संसाधन को उन्होंने एक नए दृष्टिकोण से देखा और उसे अपनी रचनात्मक पहचान का हिस्सा बनाया।

एक कलाकार से दूसरे कलाकार का संवाद
पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों के साथ-साथ मैं यूथ आइकॉन नेशनल अवार्ड का संस्थापक-निदेशक भी हूँ। इस मंच के माध्यम से समाज में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों को पहचान और सम्मान दिलाने का प्रयास किया जाता है।


मंजू शाह से बातचीत के दौरान मैंने उन्हें आगामी यूथ आइकॉन नेशनल अवार्ड समारोह के मंच तक लाने का भरोसा दिया। मेरा मानना है कि अपने हुनर से समाज में सकारात्मक बदलाव की संभावनाएँ पैदा करने वाले लोगों को व्यापक मंच मिलना चाहिए। उनके काम की चर्चा अन्य लोगों को भी प्रेरित कर सकती है और नई पीढ़ी को अपने आसपास उपलब्ध संसाधनों के उपयोग के बारे में सोचने का अवसर दे सकती है।

मंजू शाह की कला में मुझे इसी तरह की प्रेरणा दिखाई दी। पिरूल से बनी उनकी कलाकृतियाँ यह संदेश देती हैं कि स्थानीय संसाधनों को समझकर, उनमें प्रयोग करके और अपने कौशल को निखारकर नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं।

यदि ऐसे प्रयासों को प्रशिक्षण, बाजार, बेहतर डिजाइन और उचित आर्थिक सहयोग मिले, तो ग्रामीण महिलाओं के लिए आय के अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, इसके लिए उत्पादों की गुणवत्ता, बाजार की वास्तविक माँग और कारीगरों को मिलने वाले उचित पारिश्रमिक पर भी ध्यान देना आवश्यक होगा।

एक मुलाकात, जो याद रह गई
किताब कौथिग में मैं मंजू शाह को खोजने नहीं गया था। न ही उनके चेहरे से परिचित था। मैं तो उनके स्टॉल पर सजी पिरूल की कलाकृतियों को देखकर आकर्षित हुआ और जिज्ञासावश उनके बारे में पूछ बैठा। लेकिन उस एक सवाल ने एक ऐसी मुलाकात का रास्ता खोल दिया, जिसमें कला, परिचय, पारस्परिक सम्मान और भविष्य में साथ काम करने की संभावना जुड़ गई।


मुझे यह बात भी अच्छी लगी कि मंजू शाह सोशल मीडिया पर मेरे काम से परिचित थीं। आज डिजिटल माध्यम लोगों को एक-दूसरे के कार्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। लेकिन जब यह परिचय किसी आयोजन में आमने-सामने की बातचीत में बदलता है, तो उसमें एक अलग आत्मीयता जुड़ जाती है।

मेरे लिए इस मुलाकात का महत्व केवल एक कलाकार से परिचय होना नहीं था। यह उस रचनात्मक सोच को करीब से देखने का अवसर था, जो पहाड़ के एक स्थानीय संसाधन में नई संभावनाएँ तलाशती है।

किताब कौथिग में उस दिन मैं किताबों की दुनिया से अनेक नाम और संपर्क लेकर लौटा। लेकिन मंजू शाह से हुई मुलाकात ने यह भी याद दिलाया कि ज्ञान केवल पुस्तकों के पन्नों में नहीं, बल्कि उन लोगों के अनुभवों और हुनर में भी मौजूद है, जो अपने काम से समाज को कुछ नया देते हैं।

मुझे उम्मीद है कि मंजू शाह की कला और उनके प्रयासों को और व्यापक पहचान मिलेगी तथा उनके जैसे रचनात्मक व्यक्तित्वों को सम्मानित करने के अवसर बढ़ेंगे।

क्योंकि पहाड़ की असली ताकत केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता में नहीं, बल्कि उन हाथों में भी है, जो उसकी मिट्टी, जंगल और परंपराओं से प्रेरणा लेकर कुछ नया रचते हैं।

® शशि भूषण मैठाणी ‘पारस’
पत्रकार, समाजसेवी एवं संस्थापक-निदेशक, यूथ आइकॉन नेशनल अवार्ड

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