जिंदा व्यक्ति की मूर्ति का प्रचलन कोई उत्तर प्रदेश में माया युग से नहीं आया था बल्कि ऐसा पहले भी हो चुका है जहाँ तमिलनाडु में जिंदा रहते तत्कालीन मुख्यमंत्री कामराज की मूर्ति लगवा दी गई। फिर बाद में कामराज की प्रतिमा की जगह अन्नादुरई की भी मूर्ति लगा दी गई। मूर्ति स्थापना देश के हर राजनीतिक दल के लिए आज सियासत कुंजी बन चुकी है। जो कांग्रेस पटेल की मूर्ति के लिए विधवा विलाप कर रही थी वो कभी श्रीपेरंबुदूर में 12 एकड़ ज़मीन अधिग्रहीत कर राजीव गांधी की प्रतिमा लगाती है वहीँ गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा केंद्र सरकार 200 करोड़ और गुजरात सरकार द्वारा 500 करोड़ रुपये जारी कर दिए जाते हैं। इसी वजह से देश में गरीबी का ग्राफ ज्यूँ का त्यूं रहता है l दिल्ली में 245 एकड़ ज़मीन पर गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव के स्मृति-शेष रच दिए गए हैं। तो फिर कभी छत्तीसगढ़ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा की स्थापना के बाद श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भी प्रतिमा को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है तो कभी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अयोध्या में भगवान राम की जगह 50 फीट ऊंची भगवान कृष्ण की मूर्ति मंगा लेते हैं,उधर, पंजाब में युवा कांग्रेस लुधियाना में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाने की घोषणा कर देती है।

तो क्या भारत पुतलों का देश है ! इस देश के हर राजनीतिक दल का गहरा नाता है पुतलों (मूर्तियों) से । कहाँ-कहाँ और कब-कब कैसे स्थापित हुई मूर्तिया पढ़ें आगे विस्तार से ……

 

 

त्रिपुरा में बीजेपी की विजय पताका की आंधी शुरू होने के साथ-साथ चुनावी मलबे में मूर्ति दोहन फिर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विभिन्न विचारधाराओं के प्रतीक हस्तियों की मूर्तियां तोड़े जाने के मुद्दे पर राजनीति तेज हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इन घटनाओं की निंदा कर रहे हैं, लेकिन आरोप एक-दूसरे पर लगा रहे हैं ? आखिर क्यों ..? क्या भारत का लोकतंत्र किसी दल विशेष के वोट बैंक का प्रतीत मात्र रह गया है…?

किसी ने सही कहा है कि – बुत को पूजेंगे सनम-ख़ानों में जा जा के, उस के पीछे फिर मेरा ईमान रहे या न रहे…..!

हिमांशु पुरोहित । Himanshu Purohit । youth icon media । news । report । Yi award । shashi bhushan maithani paras । यूथ आइकॉन । शशि भूषण मैठाणी पारस । Avikasit Bhroon Gairsain : शहीदों के रक्त से संचित और आज की सियासत का एक अविकसित भ्रूण "गैरसैंण" 
हिमांशु पुरोहित । 

हाल में ही, त्रिपुरा में कॉमरेड लेनिन की प्रतिमा को जीत की आंधी में बुल्डोजर से ढहा दी गई। ये वही लेनिन हैं जिनके बारे में शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने कहा था, कि ‘यह एक काल्पनिक आदर्श है कि आप किसी भी कीमत पर अपने बल का प्रयोग नहीं करते, नया आन्दोलन जो हमारे देश में आरम्भ हुआ है और जिसकी शुरुआत की हम चेतावनी दे चुके हैं, वह गुरुगोविंद सिंह और शिवाजी महाराज, कमल पाशा और राजा खान आदि लेनिन के आदर्शों से प्रेरित हैं ‘ l बाबा साहब अंबेडकर ने भी कहा था कि – ‘भारत के राजनीतिक जीवन में नायक और नायक पूजा एक कड़वी सच्चाई है। क्योंकि नायक पूजा भक्तों के लिए हतोत्साहित और हिंसक बना देती है जो कि देश के लिए खतरनाक है ‘ । ऐसी आलोचनाओं का स्वागत करना चाहिए , जिनसे यह पता चले कि जिस व्यक्ति को आप महान मानकर पूजना चाहते हैं, उसकेऔर उसके विचारों के बारे जानना बहुत जरूरी है । आजडिजिटल मीडिया के युग में महान पुरुष रूपी किताबों को आसानी से पढ़ा जा सकता है । क्योंकि अब हम एक 21वीं के एक ऐसे युग में पहुंच गए हैं,जहां पॉकेटमारों, जहरखुरानों व कुत्तों से सावधान आदि जैसे नोटिस बोर्ड के साथ−साथ हमें ये बोर्ड भी लगाना पड़ेगा,जिस पर लिखा हो कि“महान पुरुषों से सावधान” । 

जिंदा व्यक्ति की मूर्ति का प्रचलन कोई उत्तर प्रदेश में माया युग से नहीं आया था बल्कि ऐसा पहले भी हो चुका है जहाँ तमिलनाडु में जिंदा रहते तत्कालीन मुख्यमंत्री कामराज की मूर्ति लगवा दी गई। फिर बाद में कामराज की प्रतिमा की जगह अन्नादुरई की भी मूर्ति लगा दी गई। मूर्ति स्थापना देश के हर राजनीतिक दल के लिए आज सियासत कुंजी बन चुकी है। जो कांग्रेस पटेल की मूर्ति के लिए विधवा विलाप कर रही थी वो कभी श्रीपेरंबुदूर में 12 एकड़ ज़मीन अधिग्रहीत कर राजीव गांधी की प्रतिमा लगाती है वहीँ गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा केंद्र सरकार 200 करोड़ और गुजरात सरकार द्वारा 500 करोड़ रुपये जारी कर दिए जाते हैं। इसी वजह से देश में गरीबी का ग्राफ ज्यूँ का त्यूं रहता है l दिल्ली में 245 एकड़ ज़मीन पर गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव के स्मृति-शेष रच दिए गए हैं। तो फिर कभी छत्तीसगढ़ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा की स्थापना के बाद श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भी प्रतिमा को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है तो कभी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अयोध्या में भगवान राम की जगह 50 फीट ऊंची भगवान कृष्ण की मूर्ति मंगा लेते हैं,उधर, पंजाब में युवा कांग्रेस लुधियाना में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाने की घोषणा कर देती है।
जिंदा व्यक्ति की मूर्ति का प्रचलन कोई उत्तर प्रदेश में माया युग से नहीं आया था बल्कि ऐसा पहले भी हो चुका है जहाँ तमिलनाडु में जिंदा रहते तत्कालीन मुख्यमंत्री कामराज की मूर्ति लगवा दी गई। फिर बाद में कामराज की प्रतिमा की जगह अन्नादुरई की भी मूर्ति लगा दी गई। मूर्ति स्थापना देश के हर राजनीतिक दल के लिए आज सियासत कुंजी बन चुकी है। जो कांग्रेस पटेल की मूर्ति के लिए विधवा विलाप कर रही थी वो कभी श्रीपेरंबुदूर में 12 एकड़ ज़मीन अधिग्रहीत कर राजीव गांधी की प्रतिमा लगाती है वहीँ गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा केंद्र सरकार 200 करोड़ और गुजरात सरकार द्वारा 500 करोड़ रुपये जारी कर दिए जाते हैं। इसी वजह से देश में गरीबी का ग्राफ ज्यूँ का त्यूं रहता है l दिल्ली में 245 एकड़ ज़मीन पर गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव के स्मृति-शेष रच दिए गए हैं। तो फिर कभी छत्तीसगढ़ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा की स्थापना के बाद श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भी प्रतिमा को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है तो कभी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अयोध्या में भगवान राम की जगह 50 फीट ऊंची भगवान कृष्ण की मूर्ति मंगा लेते हैं,उधर, पंजाब में युवा कांग्रेस लुधियाना में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाने की घोषणा कर देती है।

जिस प्रकार त्रिपुरा में बुल्डोजर से कामरेड एरा के जनक लेनिन की मूर्ति ढहा दी गई। उससे एक बात तो स्पष्ट हो गयी है कि आज के दौर में कामरेड विचारधारा मात्र एक कंकालिक सोच का परिधान मात्र रह गया है क्योंकि कम्युनिस्ट तो मूर्तियों में विश्वास नहीं करते हैं, तो फिर लेनिन की मूर्ति ढहाने पर हिंसा क्यों हो भाई ? फ़िलहाल यह प्रश्न जरूरी और जायज भी है, और नाजायज भी। वादविवाद की बात करें तो अयोध्या में राम मंदिर तो पता नहीं कब बनेगा ? लेकिन पहले ही वहां राम की सौ फीट की मूर्ति लगाने की घोषणा हो गई है। त्रिपुरा के साथ पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर-प्रदेश, केरल आदि में विभिन्न विचारधाराओं के प्रतीकों हस्तियों की मूर्तियां तोड़े या छेड़छाड़ किये जाने के मुद्दे पर राजनीति सुर्खियों में बदल गयी है । सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इन घटनाओं की निंदा कर रहे हैं, लेकिन आरोप एक-दूसरे पर लगा रहे हैं ? आखिर क्यों ………….? क्या भारत का लोकतंत्र किसी दल विशेष के वोट बैंक का प्रतीत मात्र रह गया है…….?
इसके बाद तमिलनाडु में पेरियार की मूर्ति तोड़ दी गई। अभी इन दोनों घटनाओं की छानबीन पर केंद्र सरकार जागी भी नहीं थी कि कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को तोड़, उस पर कालिख पोत दी गई। इसके बाद गुटीय झड़पें होने लगीं। इसके बाद सुनने में आया था कहीं बाबा साहेब की मूर्ति तोड़ दी गयी तो कहीं गाँधी जी की प्रतिमा से भी छेड़छाड़ की गयी है l

बीते गत वर्षों पहले,2012 के चुनावी मौसम में जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मौके पर निर्वाचन आयोग ने मायावती और हाथी की मूर्तियों को ढंकने का आदेश दे दिया था। मायावती इससे इतना घबरा गई कि उन्होंने रात के अँधेरे में ही लखनऊ में अपनी मूर्तियों का अनावरण करवा डाला। विपक्ष दल समाजवादी पार्टी ने भी मायावती के इस निर्णय पर शोक दिवस मना डाला और विरोध में मायावती की मूर्तियों पर काली पट्टियाँ बाँध दीं। एक ऐसी ही वारदात-ए-जुर्म 2015 के ज़माने में तमिलनाडु का है, जब स्थानीय प्रशासन ने,महान और महान नेताओं की मूर्तियों के चारों ओर पिंजरा लगाने का आदेश जारी कर दिया था l पिछले कुछ वर्षों से देश में मूर्ति विवाद का एक नया फैशन सा चला है। जिस जमीन पर अवैध कब्जा करना हो, वहां शरारती तत्व या तो मूर्ति लगा देते हैं अथवा धार्मिक स्थल स्थापित करने का विवाद शुरू कर देते हैं। जिसपर पुलिस और अदालत को भी घुसने में पहले सौ बार सोचना पड़ता है। चलो यह तो लाजमी भी माना जा सकता है लेकिन देश में एक और नया ट्रेंड शुरू हुआ है, जिसका प्रचलन जिंदा व्यक्ति की मूर्ति लगवाने से है । उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बसपा सुप्रीमो और भाजपा के प्रधानमंत्री ( भारत के प्रधानमंत्री ) का मंदिर इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। इतना ही नहीं,दोनों नेताओं ने सरकारी खजाने से करोड़ों रुपया अंबेडकर और पटेल की मूर्ति पर खर्च कर दिए l और आज भी सरकारी राजधानी दिल्ली में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह स्मृति भवन को मेमोरियल में बदल देने का आंदोलन जोर-सोरों से चल रहा है। जहां हरियाणा के हर ज़िले के पार्कों में देवीलाल की मूर्तियां लगी पड़ी हैं। वहीँ पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा ने भी अपने पिता रणवीर हुड्डा की स्मृति में रोहतक में स्मारक बनवा चुके हैं। राजनीति में मूर्ति पूजा आस्था नहीं, विचारों से खेलने का माध्यम मात्र है । देश के कोने-कोने में लगी महापुरुषों की मूर्तियों के अनावरण के बाद उनकी समुचित देखभाल,साफ-सफाई ना तो उनके अनुयायी समुदाय को याद रहती है ना ही बनवाने को । मात्र साल में उनकी जयंती के दिन ही उन मूर्तियों को दुबारा पाला-पोषा जाता है .  सही मायने में कहा जाये तो मूर्ति भंजन इत्यादि से समाज में उत्तेजना फैलाने, हिंसक घटनाएं होने का सिलसिला भी आज तक थमा नहीं रहा है ।

वैसे देखा जाये तो जिंदा व्यक्ति की मूर्ति का प्रचलन कोई उत्तर प्रदेश में माया युग से नहीं आया था बल्कि ऐसा पहले भी हो चुका है जहाँ तमिलनाडु में जिंदा रहते तत्कालीन मुख्यमंत्री कामराज की मूर्ति लगवा दी गई। फिर बाद में कामराज की प्रतिमा की जगह अन्नादुरई की भी मूर्ति लगा दी गई। मूर्ति स्थापना देश के हर राजनीतिक दल के लिए आज सियासत कुंजी बन चुकी है। जो कांग्रेस पटेल की मूर्ति के लिए विधवा विलाप कर रही थी वो कभी श्रीपेरंबुदूर में 12 एकड़ ज़मीन अधिग्रहीत कर राजीव गांधी की प्रतिमा लगाती है वहीँ गुजरात में सरदार पटेल की प्रतिमा केंद्र सरकार 200 करोड़ और गुजरात सरकार द्वारा 500 करोड़ रुपये जारी कर दिए जाते हैं। इसी वजह से देश में गरीबी का ग्राफ ज्यूँ का त्यूं रहता है l दिल्ली में 245 एकड़ ज़मीन पर गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव के स्मृति-शेष रच दिए गए हैं। तो फिर कभी छत्तीसगढ़ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा की स्थापना के बाद श्यामाप्रसाद मुखर्जी की भी प्रतिमा को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है तो कभी पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अयोध्या में भगवान राम की जगह 50 फीट ऊंची भगवान कृष्ण की मूर्ति मंगा लेते हैं,उधर, पंजाब में युवा कांग्रेस लुधियाना में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाने की घोषणा कर देती है। और इससे दिल्ली की सिख रियासत फिर 1984 के दंगों को याद कर आन्दोलंरित हो जाते हैं l
प्रतिमाजीवी सियासत से जुड़ा बेहद रोचक व हास्यास्पद व्यथा-कथा तो अपने उत्तराखंड की ही है। बात जुलाई 2016 की है। जहां राजधानी देहरादून में विधानसभा के नज़दीक रिस्पना पुल के पास शहीद घोड़े शक्तिमान की प्रतिमा को अनावरण से ठीक पहले हटा लिया गया। कहानी भी कुछ ऐसी थी कि जब विधानसभा के सामने भारतीय जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान उत्तराखंड पुलिस के घोड़े शक्तिमान का पैर टूट जाता है जिसका आरोप भाजपा मसूरी विधायक गणेश जोशी पर लगता है इसी घटनाक्रम में उनको गिरफ्तार कर लिया जाता है । गिरफ़्तारी में उनको दो दिन जेल में बिताने पड़े थे । फिर क्या, फिर शक्तिमान की कृत्रिम टांग लगाई गई। बाद में शायद शक्तिमान की इच्छा मृत्यु हो गई ? इस पर भी पक्ष-विपक्ष में जमकर सियासत रंग की होली खेली गयी । इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने रिस्पना पुल के पास के चौराहे का नाम शक्तिमान चौक ही घोषित कर दिया, फिर रिस्पना पुल पर एक चबूतरा बना दिया गया । और उस पर राजनीतिक मोक्ष प्राप्त शक्तिमान की प्रतिमा रख दी गई। इस पर भोली-भाली जनता ने तंज कसा कि “केदारनाथ आपदा में मारे गए लोगों के लिए तो सरकार ने कोई स्मारक नहीं बनवाया, और घोड़े की यहां प्रतिमा लगाई जा रही है” ? इसके बाद अनावरण स्थगित कर प्रतिमा हटा ली गई।

इन प्रतिमा प्रकरणों से पता चलता है कि आज हमारे देश की सत्ताजीवी राजनीतिक दल किस हद तक गिर चुके हैं ।
और यह सब जनभावनाओं के दोहन, उनको उकसाने और हिंसा युक्त राजनीतिक क्रियाकर्मों का एक सस्ता और प्रभावशाली माध्यम बनचूका है । उपरोक्त सभी घटनाक्रम प्रतिमाजीवी राजनीति से ही ओत-प्रोत है । शायद किसी ने सही कहा है कि –
बुत को पूजेंगे सनम-ख़ानों में जा जा के, उस के पीछे फिर मेरा ईमान रहे या न रहे………….!

By Editor

2 thoughts on “Statues : तो क्या भारत पुतलों का देश है ! इस देश के हर राजनीतिक दल का गहरा नाता है पुतलों (मूर्तियों) से । कहाँ-कहाँ और कब-कब कैसे स्थापित हुई मूर्तिया पढ़ें आगे विस्तार से ……”
  1. मै ब्यक्तिगत रूप से प्रतिमा विरोधी हूं जितना पैसा निर्जीव मूर्ति मे बहाना है उतना विकासकार्यो मे लागायाीजा सकता है
    आज अपने आदर्शो का प्रचार करने के कही morden तरीके है
    So I agreed fully your though champ

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