ग्रामीण मेलों का महत्व और मैठाणा मेले की राजकीय मेले तक की यात्रा – हौसले की जीत
मेले सिर्फ आयोजन नहीं, गाँव की आत्मा होते हैं!
शहरों में मॉल और सिनेमा हो सकते हैं, लेकिन पहाड़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मेला ही सबसे बड़ा उत्सव होता है। मेला सिर्फ झूला, चरखी, मौत का कुंआ, समोसा या जलेबी नहीं है। मेले से गाँवों का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक विकास होता है। जहाँ किसान अपनी फसल, बुनकर अपना ऊन, महिला समूह अपने अचार-पापड़ सीधे बेचते हैं। कह सकते हैं कि 4 दिन का मेला ग्रामीण क्षेत्रों में पूरे साल की रोज़मर्रा का बाजार बन जाता है।
सामाजिक, रचनात्मक व सकारात्मक विचारों की त्रिवेणी से आकार लेती संघर्षो की यह कहानी बताती है कि अगर हौसला न हारो और निरंतरता बनाए रखो तो सफलता जरूर मिलती है। 2015 में एक कनात से शुरू हुआ सपना आज राजकीय मेला बन गया। यह उन सभी स्वर्गीय आत्माओं को सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने इसकी नींव रखी और उन युवाओं के हौसले को सलाम है जिन्होंने इसे बुझने नहीं दिया। मैठाणा मेला कमेटी को बधाई और मुख्यमंत्री धामी जी का हृदय से धन्यवाद।
गांव के युवा लडके लड़कियां जब मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं, मंच संचालन करता है, खेल प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करते हैं तो उससे उनका शाररिक मानसिक विकास होता है। जब गाँव का युवा मंच संभालता है, माइक पर बोलता है, खेल का रेफरी बनता है, तो उसके अंदर का डर खत्म होता है। मतलब मेला एक अच्छा लीडर भी पैदा करता है। क्षेत्रिय विकास की शुरुआत होती मेला मैदान से! मेला सिर्फ एक स्थान या एक गांव के विकास का माध्यम नहीं होता है बल्कि उस पूरे बड़े ईलाके के लिए विकास का केंद्र बना जाता है मेला मैदान। जहाँ मेला लगता है, वहाँ सड़क, बिजली, पानी और प्रशासन की नजर खुद-ब-खुद पड़ती है। अलकनंदा मेले ने मैठाणा, दशौली, सैकोट, मासौं, नैथोली पूरी न्याय पंचायत को एक पहचान दी है।
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लेकिन मेले जितने खूबसूरत लगते हैं, उन्हें आयोजित करना उतना ही कठिन होता है।
एक-दो बार तो कम उम्र के जोश और ऊर्जा में कोई भी मेला करवा लेता है, लेकिन असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। चंदे के लिए दर-दर भटकना, सामाजिक ताने सुनना, आर्थिक तंगी, मानसिक दबाव और सबसे बड़ी बात कि जो लोग कुछ नहीं करते हैं उनके लिए सबसे आसान काम होता है आयोजकों पर शंका-संदेह करना… उनकी पहली सोच होती है कि ये पैसा खा रहे होंगे । फिर भी ऐसी नकारात्मक सोच और सभी विघ्न बाधाओं की परवाह न करते हुए जो आयोजक निरंतर आगे बढ़ते हैं वही मिसाल कायम भी करते हैं। इसी तरह मैठाणा मेला कमेटी जो मेले को 11 साल तक निरंतर खींच कर लाती है, वह सच में हौसले को प्रमाणित करती है।
इसी क्रम में मेले के संस्थापक सदस्यों में से एक चंडी प्रसाद थपलियाल बताते हैं, कि वर्ष 2015 में हमारे मन में एक ख्याल आया कि सभी क्षेत्रों में मेलों का आयोजन होता है और बड़े मंत्री, अधिकारी, नेता वहां जुटते हैं और उस क्षेत्र का विकास भी होता है, तो क्यों हम लोग भी मैठाणा न्याय पंचायत क्षेत्र के सभी गांवों का एक सामूहिक मेला आयोजित करें! इसके लिए हमने बिना किसी संसाधनों से 2015 में मेले की नींव रखी और बड़ा रिस्क लेते हुए मेला प्रारम्भ कराया। जिसके पहली कार्यकारणी में
कमल किशोर सती (कोषाध्यक्ष), चण्डी प्रसाद थपलियाल (अध्यक्ष), राकेश खनेडा (संरक्षक), कमल कान्त मिश्रा (सचिव) साथ मैठाणा और सैकोट के एक एक आदमी ने तन, मन, धन से हमारा सहयोग किया। लेकिन दुःखद यह भी रहा कि इस एक दशक के बीच हमने अपने दो महत्वपूर्ण कर्मठ सदस्यों में स्व. कमल कान्त मिश्रा और स्व. कमल किशोर सती को खो दिया है जिससे मेला कमेटी को गहरा धक्का लगा।
चंडी थपलियाल बातचीत में आगे बताते हैं कि अगर कमेटी में राकेश खनेड़ा, विक्रम सिंह बर्त्वाल के निरंतर प्रयास न होते तो आज यह मेला राजकीय मेला भी घोषित न होता। विशेष धन्यबाद ज्ञापित करते हैं, सैकोट से शिक्षक रामलाल आर्य और मैठाणा से शिक्षक यशवंत लोहानी का इन दोनों लोगों का सिर्फ शारीरिक और मानसिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक मदद भी मेला कमेटी को मिलता रहा है। चंडी थपलियाल बताते हैं कि सैकोट से हरीश सेमवाल भी हर बार हमारे साथ खड़े रहे जब कभी भी मेला संचालन में आर्थिक रुकावट आती तो वह मजबूत स्तम्भ की तरह साथ खड़े रहते हैं। चंडी का मानना है कि बिना क्षेत्रिय जनता के सहयोग के इस तरह के आयोजनों का सफल होना नामुमकिन होता है। उन्होने आभार जताया मैठाणा, सैकोट, पलेठी, घुड़साल, मासों डिडोली सहित क्षेत्र के सभी ग्रामवासियों, प्रबुद्धजनों का जिनका भरपूर सहयोग हर कदम पर मेला आयोजन हेतु कमेटी को मिलता रहा है।
हालांकि सहयोग करने वालों के नामों की बड़ी फेहरिस्त चंडी थपलियाल गिनाते हैं, लेकिन सबके नामों जिक्र करना असंभव है। लगातार सहयोग करने वाले चुनिंदा ही होते हैं, और उन्हीं के दम पर यह कारवां चलता है।
मेला कमेटी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का विशेष आभार व्यक्त किया है। आयोजकों के अथक प्रयासों के बाद आखिरकार मुख्यमंत्री धामी ने अलकनंदा तट पर आयोजित होने वाले मैठाणा मेले को राजकीय मेला बनाने की घोषणा कर दी है।
कमेटी ने मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद से राहत की सांस लेते हुए कहा कि अब उन्हें व्यवस्थाएं जुटाने के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा। हालांकि अभी घोषणा है जिसका धरातल पर उतरना बाकी है। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद बेशक़ मैठाणा मेला सरकारी जैसा हो गया है, परन्तु अभी बहुत काम करना बाकी है। फिलहाल इस घोषणा से हमारे उत्साह में इजाफा हुआ है हमें सफलता मिली है और इस सफलता में हमारे मुख्य सहयोगी क्षेत्रिय विधायक भूपाल राम टमटा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अब मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद मेला कमेटी को खुलकर स्थानीय प्रशासन का सहयोग मिल सकेगा। ![]()
कुलमिलाकर चंडी थपलियाल से बातचीत के बाद मैं मानता हूँ कि राकेश खनेड़ा, विक्रम बर्त्वाल और चंडी प्रसाद थपलियाल के सामाजिक, रचनात्मक व सकारात्मक विचारों की त्रिवेणी से आकर लेती संघर्षो की यह कहानी बताती है कि अगर हौसला न हारो और निरंतरता बनाए रखो तो सफलता जरूर मिलती है। 2015 में एक कनात से शुरू हुआ सपना आज राजकीय मेला बन गया। यह उन सभी स्वर्गीय आत्माओं को सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने इसकी नींव रखी और उन युवाओं के हौसले को सलाम है जिन्होंने इसे बुझने नहीं दिया। मैठाणा मेला कमेटी को बधाई और मुख्यमंत्री धामी जी का हृदय से धन्यवाद।
शशि भूषण मैठाणी “पारस”