इस देश में विडंबना देखिए। अगर आप किसी जानवर को दुत्कारेंगे, पीटेंगे, भूखा रखेंगे या जहर देंगे तो आपके खिलाफ तुरंत कानून का शिकंजा कसेगा।
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 11(1)(a) से (h) के तहत जानवर को पीटना, लात मारना, प्रताड़ित करना, उसे पर्याप्त भोजन-पानी न देना, बीमार हालत में तड़पने के लिए छोड़ देना – सभी संज्ञेय अपराध हैं। इसी तरह पुरानी IPC की धारा 428 और 429, जिसे अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 325 में समाहित किया गया है, के तहत किसी पशु को मारने, जहर देने या अपंग करने पर 5 साल तक की जेल और जुर्माना का प्रावधान है और यह गैर-जमानती अपराध है। अच्छी बात है, होनी भी चाहिए।
पर सवाल यह है कि क्या इंसानों के एक वर्ग, खासकर सवर्ण समाज, ब्राह्मण, राजपूत, बनिया, के सम्मान की रक्षा के लिए ऐसा कोई कानून है?
आज सोशल मीडिया पर खुलेआम ठाकुरों की शौर्यता, ब्राह्मणों की चोटी धोती, सनातन देवी देवताओं का उपहास उड़ाया जा रहा है। भद्दी गालियों की बौछार हो रही है। शिकायत करो तो सुनवाई नहीं, और अगर स्वाभिमान में विरोध कर दिया तो उल्टा आपके ऊपर SCST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हो जाता है।
मुआवजा या इनाम? जब कानून अपराध को प्रोत्साहन बन जाए, SCST अत्याचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य पवित्र था, वंचितों को सुरक्षा देना। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अदालतों ने खुद इसकी विसंगतियों पर सवाल उठाए हैं, इस कानून के तहत पीड़ित को तत्काल सरकारी आर्थिक सहायता मिलती है। नियमों के अनुसार FIR के बाद 25%, चार्जशीट पर 50% और सजा पर 25% राशि दी जाती है। इसी प्रावधान का दुरुपयोग कई बार सामने आया है।
इसके जीवंत उदाहरण हमारे सामने है :
पहला मामला है झांसी का , 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में उजागर हुआ, एक ही दलित परिवार, जिसमें पेशे से दलित वकील भी शामिल था, ने अलग-अलग SC/ST मामलों में 23 लाख 36 हजार 250 रुपये की सहायता हड़प ली, और 10 से 12 अन्य मामले अभी भी मुआवजे के लिए लंबित थे। इस पर हाईकोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश में ऐसे बार-बार मुआवजा लेने के मामलों की जांच और मॉनिटरिंग सिस्टम बनाने का आदेश दिया है।
दूसरा मामला हाथरस का, 2019 में दर्ज एक SCST केस में वादी खुद अपने बयान से पलट गया। कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए वादी के खिलाफ केस दर्ज करने और ली गई सहायता राशि एक महीने में वापस करने का आदेश दिया।
केंद्र सरकार की आंकडों के अनुसार 2022-23 से 2024-25 के बीच इस योजना के तहत कुल 1 हजार 423 करोड़ रुपये से अधिक की केंद्रीय सहायता राज्यों को दी गई है। अब सवाल सहायता का नहीं, सवाल इसकी पारदर्शिता और दुरुपयोग को रोकने के तंत्र का है।
इसीलिए यह आरोप लगता है कि कुछ लोग इसे दबाव बनाने और तुरंत मुआवजा पाने का हथियार बना रहे हैं। एक अजीबोगरीब घटना हरियाणा की ही देख लो जो आजकल सोशल मीडिया पर खूब वायरल है, जहाँ एक घर में आधी रात को चोर घुस जाते हैं, घर में रहने वाले लोगों नींद खुल जाती है चोर पकडे जाते हैं, लेकिन चोरों को पता चला कि जिस घर में हम घुसे उसका मालिक सवर्ण है तो उन्होंने उल्टा मकान मालिक पर SCST केस दर्ज कर दिया, अब उन्हें चोरी के माल से कई गुणा अधिक सरकार से मुआवजा भी मिलेगा सरकार से वो भी पूरे रूपये 12 लाख। अब यहां पर सवाल मेरा अपने उन भले पढ़े लिखे सभ्य सामाजिक, संस्कारी दलित जनों से है कि क्या आप सब भी इन घटित घटनाओं का समर्थन करते हो? इसी हरियाणा वाले मामले में देखिए, चोरों के चर्चित आरोपों ने तो इस आशंका को और गहरा कर दिया है कि कानून का भय दिखाकर पीड़ित को ही आरोपी बना दिया जाता है।
जब नफरत की जुबान पर कानून खामोश हो जाए,और कुछ तथाकथित नेता जिनमें चंद्रशेखर रावण, गोल्डन दास, दामोदर यादव जैसे नफरती चिंटू दिन-रात सवर्ण जाति विशेष के खिलाफ #जहर उगलते हैं, समाज को बांटने वाले बयान देते हैं, तब कानून की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है। सवर्ण समाज 2017 से लगातार इस तरह की गाली-गलौज को सहन करता आ रहा है। 2026 में UGC के नए समानता संबंधी प्रावधानों को लेकर जो आशंका जताई गई कि यह शिक्षण संस्थानों में सवर्ण बच्चों को निशाना बनाएगा, उसने आक्रोश को सड़कों तक ला दिया है।
इस माहौल में जब किसी दलित युवक द्वारा सवर्ण समाज या हिंदू देवी देवताओं पर अभद्र टिप्पणी के बाद उसकी हत्या जैसे दुर्भाग्यपूर्ण मामले सामने आते हैं, तो मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं किसी भी तरह की हत्या या हिंसा का समर्थक नहीं हूं। लेकिन यह स्थिति बताती है कि देश किस खतरनाक मोड़ पर खड़ा है। जब कानून एक पक्ष को सुने ही नहीं, तो समाज में असंतोष विस्फोटक बन जाता है।
ऐसे में सबका साथ, सबका विकास कैसे? हम समानता की बात करते हैं। संविधान सबको बराबर मानता है। फिर न्याय दोहरा क्यों? सरकार को सोचना होगा कि…..
मुकदमा दर्ज होते ही इनाम के तौर पर मुआवजा बांटना बंद हो। मुआवजा जांच के बाद, और झूठा साबित होने पर वसूली व सख्त सजा का प्रावधान हो। आधी समस्या वहीं खत्म हो जाएगी।
एक ऐसा निष्पक्ष कानून लाया जाए कि कोई भी जाति, चाहे सवर्ण हो या दलित, अगर दूसरी जाति का अपमान करे तो उस पर समान और सख्त कार्रवाई हो। अपमान का लाइसेंस किसी को नहीं मिलना चाहिए।
वोट बैंक के लिए अंधे कानून थोपने के बजाय राष्ट्र की सुख-शांति और स्थिरता को प्राथमिकता दी जाए।
जानवरों की रक्षा जरूरी है, लेकिन इंसानों के सम्मान की रक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी है। अगर कानून ही अपराध को प्रोत्साहन देने लगे, तो वह कानून नहीं, अन्याय है।
शशि भूषण मैठाणी पारस