आज इस लडके से दून के एक जाम में हुई मुलाकात ने दिल जीत लिया। सल्यूट
आज शाम मैं अपनी कुछ दवाइयाँ लेने घर से पैदल निकला। समय करीब 7:20 का था, गाड़ी नहीं ली थी। मैं जैसे ही मोहनी रोड गुरुद्वारा, बलबीर रोड और लक्ष्मी रोड मोहनी रोड चौराहे की तरफ पहुँचा, वहाँ का नजारा देखकर ठिठक गया। चारों तरफ जबरदस्त जाम था। लक्ष्मी रोड-मोहनी रोड चौराहा पूरी तरह पैक हो चुका था। गाड़ियाँ जहाँ-तहाँ खड़ी थीं। कई लोग अपनी गाड़ियाँ बंद करके बैठे थे। हालात ऐसे थे कि पैदल निकलने की जगह तक नहीं बची थी।
मैंने सोचा, देखते रहने से बेहतर है कुछ किया जाए। मैं अकेले ही चौराहे पर खड़ा हो गया और वाहनों को व्यवस्थित कराने की कोशिश शुरू कर दी। सबसे पहले चौराहे पर अस्त-व्यस्त खड़े वाहनों को साइड करवाया। अच्छी बात यह रही कि अधिकांश लोगों ने सहयोग किया और धीरे-धीरे रास्ता खुलने लगा।
हालाँकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें लाइन में लगने से ज्यादा दूसरों की लाइन तोड़कर आगे निकलने की आदत होती है। यह दृश्य हम सब रोज देखते हैं। इसी बीच एक युवक ने मुझे देखा। वह भी मेरे पास आकर यातायात व्यवस्थित कराने में मदद करने लगा।
मैंने उससे कहा, तुम दूसरी तरफ खड़े हो जाओ। मुझे देखते रहना। मैं जिस तरफ इशारा करूँ, उस तरफ की गाड़ियों को रोकना और छोड़ना। उसने भी बिना किसी सवाल के वही किया।
करीब 40 मिनट तक हम दोनों चौराहे पर खड़े रहे और धीरे-धीरे यातायात सामान्य हो गया। लेकिन इन 40 मिनटों में मेरा गला सूख गया। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था, फिर भी लगा कि जब तक रास्ता सुचारु नहीं हो जाता, यहाँ से हटना ठीक नहीं। और इसी दौरान उस युवक ने मेरा दिल जीत लिया। ट्रैफिक सामान्य होने के बाद मैंने उसे आवाज देकर अपने पास बुलाया।
नाम पूछा तो उसने बताया.. शिवम राज सिंह। वह कक्षा 12वीं का छात्र है और डिफेंस स्कूल में पढ़ रहा है। उसने बताया कि वह भी मोहनी रोड के आखिरी हिस्से में रहता है। हमने साथ में एक सेल्फी ली। मैंने उसका मोबाइल नंबर लिया। मैंने उसे कहा.. यहाँ अक्सर सुबह, दोपहर और शाम को भारी जाम लगता है। अगर ऐसी स्थिति दिखे तो क्या तुम आगे भी आकर सहयोग करोगे? उसने बिना सोचे कहा, बिल्कुल।
हम दोनों ने नंबर साझा किए और तय किया कि जब भी जरूरत होगी, यातायात व्यवस्था में अपनी तरफ से सहयोग करेंगे। मैं देहरादून में हमेशा नहीं रहता। कभी-कभी ही रहना होता है, लेकिन जितना भी रहूँगा, पहले की तरह अपनी क्षमता के अनुसार सामाजिक जिम्मेदारी निभाता रहूँगा।
लेकिन आज की शाम की सबसे बड़ी सीख मुझे शिवम से मिली। एक 12वीं का छात्र, जिसने न किसी ने उसे बुलाया, न कोई जिम्मेदारी सौंपी, न कोई सरकारी आदेश था। उसने सिर्फ यह देखा कि रास्ते में समस्या है और कोई व्यक्ति उसे ठीक करने की कोशिश कर रहा है।
वह चुपचाप मेरे साथ खड़ा हो गया। यही तो असली नागरिक जिम्मेदारी है।अगर हमारे नौजवान इतनी छोटी उम्र से ही अपने आसपास की समस्याओं को अपनी समस्या समझकर समाधान में हाथ बँटाने लगें, तो निश्चित रूप से उनमें एक जिम्मेदार नागरिक और सच्चे राष्ट्र सेवक के गुण विकसित होंगे। सल्यूट शुभम!
आज मैं उन तमाम पुलिसकर्मियों को भी दिल से सल्यूट करता हूँ जो रोज इसी तरह शहर के चौराहों पर खड़े होकर यातायात संभालते हैं। मुझे तो सिर्फ 40 मिनट में ही गला सूखने लगा था। उस दौरान बार-बार यही सोच रहा था कि जून की तपती दोपहरी में घंटों चौराहे पर खड़े रहने वाले उन पुलिसकर्मियों की क्या हालत होती होगी?
हम अक्सर सड़क पर खड़े ट्रैफिक पुलिसकर्मी को देखकर सोचते हैं कि वह तो बस हाथ हिला रहा है। लेकिन जो काम बाहर से आसान दिखाई देता है, वह हमेशा आसान नहीं होता। धूप, धूल, धुआँ, शोर, लगातार खड़ा रहना और हर दिशा से आने वाले वाहनों के बीच संतुलन बनाना, यह भी सेवा ही है।
इसलिए आज की शाम मेरे लिए सिर्फ एक जाम खत्म करने की शाम नहीं थी। आज एक जाम के बीच मुझे एक शुभम मिला… और एक शुभम ने मुझे उम्मीद दी कि हमारी अगली पीढ़ी अभी भी जिम्मेदारी समझती है।
ऐसे हर युवक-युवती को मेरा सलाम। जय हिन्द। जय भारत। जय उत्तराखंड।
®शशि भूषण मैठाणी पारस